इसी तरह हमारी शुद्ध वित्तीय बचत भी बढ़ी है। यह 2017-18 में 6.5% रही, जबकि एक वर्ष पहले यह आंकड़ा 6.2% था। हालांकि इन वर्षों में हमारे वित्तीय दायित्व (लायबिलिटी) भी बढ़ें है। यह 2017-18 में 4.3% हो गई जबकि एक वर्ष यह 3% ही थे। हालांकि विकास दर 5% होने के बाद सेविंग के संदर्भ में विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों के पास पैसा है लेकिन वे अभी खर्च करना नहीं चाह रहे हैं।
अर्थव्यव्स्था की यह सुस्ती मांग में कमी के कारण है। दैनिक भास्कर से बात करते हुए मारुति-सुजुकी के चेयरमैन आरसी भार्गव कहते हैं कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा सुस्ती चक्रीय है। ऐसा दशक में एक बार होता है। परेशानी यह है कि लोग खर्च नहीं करना चाह रहे हैं, जबकि उनके पास पैसा है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री समीर नारंग कहते हैं कि जब भी अर्थव्यवस्था में सुस्ती आती है, लोग बैंकों की एफडी में ज्यादा निवेश करते हैं। वे टूथपेस्ट और जरूरी खाद्य पदार्थों को तो खरीदना जारी रखते हैं लेकिन टीवी, बाइक और कार जैसे खर्च से बचते हैं।
ऐसे आर्थिक माहौल में सोने की कीमत भी बढ़ती है लेकिन इसका घरेलू अर्थव्यवस्था की स्थिति से ज्यादा लेना-देना नहीं होता है। वहीं क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डीके जोशी कहते हैं कि थोड़ी सेविंग बढ़ना तो अच्छी बात है लेकिन अर्थव्यवस्था में अभी ग्रोथ कमजोर है। इसलिए सेविंग के सामने चुनौती है, इस वक्त इसका बढ़ना मुश्किल है। वर्ष 2008 में ग्रॉस सेविंग दर अधिक थी, यह दर वापस कब तक आ जाएगी, पूछने पर जोशी कहते हैं कि इसके लिए अर्थव्यवस्था की विकास दर 8-9 फीसदी तक होनी चाहिए। मार्च 2018 में ग्रॉस सेविंग दर 30.51 फीसदी है जो पिछले वर्ष से 0.26 फीसदी अधिक है।
आम आदमी के बचत के सवाल पर पूर्व मंत्री और अर्थशास्त्री वाय के अलघ कहते हैं कि सेविंग की चिंता नहीं है। अभी अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ना चाहिए। निवेश बढ़ेगा तो स्थिति में सुधार आएगा। केयर रेटिंग के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनविस कहते हैं कि वर्ष 2008 के आर्थिक संकट के समय सरकार ने प्रोत्साहन पैकेज दिया था, जिससे लोगों में विश्वास बढ़ा था। जबकि इस समय अर्थव्यवस्था में सुस्ती दिख रही है और अभी तक सरकार ने कोई प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा नहीं की है।
हालांकि उन्होंने बिजनेस के माहौल को बेहतर करने के कई प्रयास किए हैं लेकिन इससे कंज्यूमर का कॉन्फिडेंस नहीं आ पा रहा है। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं सेविंग अभी स्थिर है, इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में समस्या बनी हुई है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री केंस ने कहा था कि सभी लोग अगर बचत करेंगे तो खपत कम होगी। और खपत कम होगी तो उत्पादन गिर जाएगा। इसलिए अर्थव्यस्था में इन्वेस्टमेंट बढ़ाना पढ़ेगा। सिर्फ ब्याजदरें कम करने से काम नहीं चलेगा।