यूनियन बैंक एंप्लाईज एसोसिएशन के अधिवेशन में निजीकरण के खिलाफ बनी संघर्ष की रणनीति, महासचिव निर्वाचित हुए कॉमरेड देवेंद्र खरे
भोपाल। देश के बैंकों में एक लाख से ज्यादा पद खाली होने से मौजूदा स्टाफ कार्यभार से पिस रहा है, लेकिन केंद्र सरकार निजीकरण के एजेंडा को आगे बढ़ाने में जुटी है। इसके विरोध में अभी तक 6 राष्ट्रव्यापी हड़तालें हो चुकी हैं, जिसके और उग्र आंदोलन किया जाएगा।
यह विचार यूनियन बैंक एंप्लाईज एसोसिएशन (मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़) के आठवें त्रिवार्षिक अधिवेशन में व्यक्त किए गए। वहीं कॉमरेड देवेंद्र खरे नए महासचिव निर्वाचित हुए। भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता राष्ट्रीय महासचिव एन शंकर ने की। वहीं मप्र मध्य प्रदेश बैंक एंप्लाईज एसोसिएशन के महासचिव वीरेंद्र कुमार शर्मा, दीपक रत्न शर्मा, यूनियन बैंक आफ इंडिया के उपमहाप्रबंधक लालचंद झरवाल, सहायक महाप्रबंधक बालाजी, देवेंद्र चौबे, यूनियन बैंक आॅफ इंडिया के पीएफ ट्रस्टी जयंत कुंदर, पीके माहेश्वरी, डीएम मोटवानी, कोमल सांवेर एवं देवेंद्र खरे थे। इस मौके पर निजीकरण का विरोध करने के साथ ही आईबीसी के नाम पर लूट मची होने का आरोप लगाया गया। अधिवेशन में कर्मचारियों की नौकरियों की सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक बैंकिंग, युवाओं बेरोजगारों, किसानों के बारे में बात की गई। अधिवेशन मैं आगामी सत्र के चेयरमैन डीएम मोटवानी, अध्यक्ष कोमल सांवेर, महासचिव देवेन्द्र खरे, कोषाध्यक्ष कृष्णा पांडे, उप महासचिव आरएल कदम, जोगिंदर सिंह, शैलेश कुकरेजा आदि का सर्व सम्मति से निर्वाचन किया गया। वहीं मध्य प्रदेश बैंक एंप्लाईज एसोसिएशन के साथी अशोक पंचोली, जेपी दुबे, अमित गुप्ता, श्रीपाद घोटनकर, संतोष मालवीय के अलावा मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के सैकड़ों यूनियन बैंक कर्मी थे।
एक लाख पद खाली
इस मौके पर वीरेंद्र शर्मा ने बताया कि बैंकों में एक लाख पद खाली होने से मौजूदा स्टाफ पर कार्यभार बढ़ता जा रहा है। आईबीसी के नाम पर कारपोरेट लूट मची हुई है, खराब ऋणों की अधिकांश राशि कार्पोरेट के नाम पर है। ऐसे में ऋण नहीं चुकाने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाया जाए। शर्मा ने कहा कि 6 राष्ट्रव्यापी हड़तालें की जा चुकी हैं, इसके बाद आंदोलन और तेज किया जाएगा।
खराब ऋणों की विकराल होती समस्या
बैंकों में सबसे बड़ी समस्या बढ़ते हुए खराब ऋणों की है। आईबीसी के नाम पर बैंकों में दिनदहाड़े कारपोरेट लूट मची हुई है। बैंकों में खराब ऋणों की अधिकांश राशि कॉर्पोरेट के नामे हैं। यूनियन ने मांगा की है कि जानबूझकर बैंक ऋण नहीं चुकाना दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाया जाए एवं जानबूझकर ऋण नहीं चुकाने वालों को अपराधी घोषित किया जाए। बैंकों में जमा राशि आम आदमी की है। इसका उपयोग देश के विकास, रोजगार सृजन एवं कल्याणकारी योजनाओं में होना चाहिए ना कि कारपोरेट लूट के लिए। निजीकरण के खिलाफ संघर्ष जारी है। यदि सरकार ने निजीकरण के एजेंडा को विराम नहीं दिया तो आगे आने वाले दिनों में आंदोलन को तेज कर और राष्ट्रव्यापी हड़तालें की जाएगी।

