नई दिल्ली। अर्थशास्त्र में नोबेल अवॉर्ड पाने वाले अभिजीत बनर्जी और पत्नी एस्थर डुफ्लो गरीबी को समझने के लिए फील्ड से जुड़े प्रयोग करते थे। उन्होंने संतुलित ट्रायल के लिए मेडिकल रिसर्च की दुनिया की इस बेसिक तकनीक को अपनाया। आकस्मिक (रेन्डम) सेलेक्शन के जरिए लोगों के दो समूह बनाए। एक समूह को कुछ सुविधाएं दी गईं। दूसरे को उसके हाल पर छोड़ दिया। इसके जरिए उन्होंने यह पता लगाया कि पहले समूह पर जो खर्च किया, क्या उसके पर्याप्त नतीजे हासिल हुए?
कुछ सालों पहले बनर्जी और डुफ्लो राजस्थान के उदयपुर में काम कर रहे थे। वहां उन्होंने देखा कि महिलाएं सरकारी क्लीनिक पर बच्चों को फ्री टीकाकरण के लिए नहीं ला रही थीं। तब मन में सवाल उठा कि महिलाएं उनके लिए बनाई गई योजना का फायदा क्यों नहीं ले रहीं? इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए? फ्री टीकाकरण के साथ करीब 1 किलो दाल देने का ऑफर भी शुरू किया गया तो टीकाकरण की दर 18% से बढ़कर 39% हो गई। इससे प्रति टीकाकरण की लागत भी 56 डॉलर से घटकर 28 डॉलर रह गई, क्योंकि ड्यूटी पर तैनात जिन कर्मचारियों को भुगतान किया जा रहा था वे व्यस्त हो गए।
डुफ्लो की सलाह- टीकाकरण पर इन्सेंटिव देना चाहिए
सरकार को क्या करना चाहिए, इस सवाल पर बनर्जी ने कहा था कि 15 साल और इससे अधिक उम्र वालों के लिए बायोमीट्रिक पहचान के आधार पर यूनिवर्सल कैश ट्रांसफर की व्यवस्था होनी चाहिए। हादसे और गंभीर चोटों के इलाज को कवर करने वाला स्वास्थ्य बीमा हो। हर घर के 200 यार्ड के दायरे में स्वच्छ पेयजल होना चाहिए। डुफ्लो का कहना था कि टीकाकरण पर या तो कैश या फिर कुछ हेल्थ प्रोडक्ट के तौर पर इन्सेंटिव दिया जाना चाहिए। गरीब लोग टीकाकरण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे इसे टालते रहते हैं।
