(बकलम ब्रजेश जोशी)
आज देवर्षि नारद की जयंती है ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया का दिन। इस दिन नारद प्रगट हुए वे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाते हैं क्योंकि उन्हें ब्रह्मा के ही विचारों ने जन्म दिया प्रजापिता चाहते थे कि इस सृष्टि के संचालन में सर्वहित व सर्वमंगल के ध्येय के साथ सूचनाओं व विचारों के संप्रेषण के लिये कोई ऐसा पुरुष हो जो अपनी दिव्यता व कुशलता के साथ इस भूमिका को निभा सके।
ब्रह्माजी के इसी चिन्तन से नारद का प्रागट्य हुआ।
नारदजी ने यायावर बन कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की यात्रा की ओर प्राणीमात्र के मंगल के लिये अपनी विधा को माद्यम बनाया। नारद नैतिक मूल्यों व मानवीयता के धरातल खड़े थे क्योंकि इसीमें देवत्व निहीत है यानी नारद का जीवन देवीय मूल्यों के लिये ही था इसीलिये वे देवर्षि कहलाये।
यों तो नारद चरित्र बहुत विषद है यहां प्रसङ्गवश उनके कुछ अनछुए या अप्रगट प्रसङ्ग की बात करते हैं जो हम पत्रकारों को राष्ट्रमंगल की पत्रकारिता करने को प्रेरित करेंगे। दक्षिण पुराणों में उल्लेख आता है भगवान कृष्ण ने जब जरासन्ध की कैद से मुक्त करा कर 16 हजार राजकन्याओं से विवाह किया 8 रानियां पहले से ही उनकी थीं ही। 16 हजार आठ रानियों के साथ भगवान कृष्ण कैसे गृहस्थी चलाते होंगे
सभी लोकों में अदभुत विस्मय फेल गया कल्पना करें यदि उस काल में अखबार निकलते तो इस प्रसङ्ग की आठ कॉलम न्यूज फ्रंट पेज पर कम से कम आठ दिनों तक तो छपती ही टीवी चैनल्स होते 24 घण्टों की सनसनी परोसना शुरू हो जाती। हर चेनल पर यही डिबेट चलती। खेर ।
तब नारद से सभी लोकों के प्राणियों ने आव्हान किया कि-
हे नारद, आप तो सृष्टि के कण-कण से भिज्ञ हैं आप हमें बताएं कि भगवान कृष्ण कैसे 16 हजार आठ रानियों के साथ गृहस्थी चलाते हैं। नारद ने कहा यह मैं नहीं कर सकता यह उनकी निजता का अधिकार है। यह प्रसङ्ग वर्तमान में भी प्रासंगिक है।
देवताओं व राक्षसों के युद्ध में नारद राक्षसों के शिविर में जाते और उन्हें विश्वास में लेकर उनकी युद्ध नीति देवताओं को बताते यह करना लोकहित में जरूरी था। नारद विद्या से ही देवासुर संग्राम में देवता विजयी हुए। कण्व रामायण में उल्लेख है कि विभीषण जब दुविधा में था कि राम का साथ दें या राजधर्म का पालन कर रावण के ही पक्ष में रहे तब नारद ने ही विभीषण को समझाया था कि राम का साथ देना ही राज धर्म है। शिव पुराण में लिखा है समुद्रमंथन में जब विष कोन पिये यह मसला उठा तो नारद ने ही देवताओं को भगवान महादेव को विष पीने के लिये मनाने को कहा। वैसा ही हुआ।
यह तो नारद चरित्र के बहुत ही चुनिन्दा प्रसङ्ग है जो उनकी लोकहित कारी पत्रकारिता के प्रतिमान को प्रस्तुत करते हैं। वे सर्वमंगल के भाव से सबको सावधान भी करते थे। कालान्तर में पत्रकारिता को साहित्य की ही एक विधा के रूप में अपनाया गया। पहले साहित्यकार ही पत्रकार हुआ करते थे , मुंशी प्रेमचन्द,जय शंकर प्रसाद,हजारीप्रसाद द्विवेदी,रामचन्द्र शुक्ल, गणेश शंकर विद्यार्थी,और माखनलाल चतुर्वेदी ये महान साहित्यकार होकर प्रखर पत्रकार भी रहे आजादी के आंदोलन में भारतीय पत्रकारिता ने एक योद्धा की भूमिका निभाई।
कई देशभक्त नेताओं ने भी स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि बनाने में पत्रकारिता को अपनाया और समाचार पत्र निकाले गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य बाल गङ्गाधर तिलक,लाला लाजपतराय,महात्मा गांधी अब्दुल कलाम आजाद ये नेता भी पत्रकार बने। इन सबका ध्येय भी नारदीय पत्रकारिता वाला रहा। मौजूदा पत्रकारिता भी आज कठिन दौर से गुजर रही है विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। कारपोरेट की चुनोतियों व बढ़ते बाजारवाद ने पत्रकारिता को घेर रखा है लेकिन वह सुबह फिर आएगी पत्रकारिता का नारदीय चिन्तन फिर से मुखरित होगा।।
सभी मित्रों को नारद जयंती की बधाई शुभकामनाएं।
