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गायन पर्व में सुलेखा की प्रस्तुति ने सबका मन मोहा

भोपाल। सुलेखा ने अपने गायन के लिए रात में गाए जाने वाले मधुर राग *मालकौंस* का चयन किया सबसे पहले सुलेखा ने एक ताल में निबंध पारंपरिक बंदिश "पीर ना जाने"  से राग के स्वरूप को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया बुलंद , और सधी हुई आवाज के साथ सुलेखा ने मध्य तीन ताल में एक बहुत ही मधुर बंदिश प्रस्तुत की जिसके बोल थे "नभ निकस गये चंद्रमा" .  मालकौंस का  प्रभाव  रहा पूरे सभागार में छा गया जिसके रोमांच को सुलेखा ने चरम पर पहुंचाया  एक ताल में निबद्ध बंदिश " दुर्गे भवानी"  के साथ। सुलेखा की प्रस्तुति पर उपस्थित श्रोता वर्ग ने तालियों के साथ भरपूर दाद दी । सुलेखा ने अपने गायन का समापन सुमधुर राग *भैरवी* के साथ किया जिसमें एक कम प्रचलित ताल सुनंद में बंदिश प्रस्तुत की जिसके बोल थे "काहे रोकत श्याम" । भैरवी के स्वर श्रोता वर्ग के मन मस्तिष्क में छा गए जब सुलेखा ने तीन ताल में नि बद्ध तराने के साथ अपने गायन को विराम दिया। ग्वालियर घराने  की खुले गले की गायकीऔर सुव्यवस्थित स्वर विस्तार के गुणों को अपनी  गुरु *डॉ विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे* से सुलेखा ने कुशलता के साथ सीखा और प्रस्तुत किया । आपके साथ तबले पर संगत की भोपाल के ही कलाकार  डॉ अशेष उपाध्याय ने और हारमोनियम पर संगत की पुणे के *पं. उपेंद्र सहस्त्रबुद्धे* ने।  तानपुरे पर थे सुलेखा के शिष्य *आलाप भट और  कोशिका सक्सेना




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