प्रवचन में सुश्री धामेश्वरी देवी ने ‘भाग्य अथवा पुरुषार्थ—कैसे मिलेगी भगवत्कृपा’ विषय पर कहा कि भगवान को केवल बुद्धि के माध्यम से जानना संभव नहीं है। भगवान माया से परे और दिव्य हैं, जबकि मनुष्य की बुद्धि एवं इंद्रियां भौतिक प्रकृति से संबंधित हैं। उन्होंने कहा कि भगवत्कृपा के बिना भगवान का वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवत्कृपा का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को बिना प्रयास के सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। मनुष्य को अपने स्तर पर भक्ति रूपी पुरुषार्थ करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्राप्त मानव देह और कर्म करने की शक्ति का सदुपयोग ईश्वर-भक्ति में करना चाहिए, न कि अपनी असफलताओं के लिए भाग्य अथवा भगवान को दोष देना चाहिए।
सुश्री धामेश्वरी देवी ने कहा कि लोग अक्सर भक्ति के समय यह कहकर प्रयास से बचते हैं कि “मेरे भाग्य में नहीं है” या “अभी समय नहीं आया।” जबकि भाग्य को बेहतर बनाने के लिए स्वयं पुरुषार्थ करना पड़ता है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए आवश्यक पुरुषार्थ और उसकी शर्तों का विस्तार आगामी प्रवचन में बताया जाएगा।