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बरहज आश्रम: जहाँ बिस्मिल जी की अस्थियाँ आज भी भारत की आत्मा बनकर धड़कती हैं, राष्ट्रीय स्मारक की माँग तेज

  • बरहज आश्रम स्थित अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' जी की समाधि पर महुआ डाबर संग्रहालय परिवार ने किया नमन, बलिदान शताब्दी शिलालेख और राष्ट्रीय स्मारक की माँग तेज
बरहज, देवरिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सर्वाधिक शहादत देने वाले गौरवशाली क्रांति-तीर्थ महुआ डाबर (बस्ती) के वंशजों द्वारा संचालित महुआ डाबर संग्रहालय परिवार ने पावन बरहज आश्रम पहुँचकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कमांडर-इन-चीफ, अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' जी की समाधि-स्थल और प्रतिमा पर श्रद्धा-सुमन अर्पित किए।


महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राना, क्रांतिकारी विचारक अविनाश कुमार गुप्ता और संग्रहालय परिवार के सदस्यों ने समाधि पर पुष्प अर्पित कर, सौ वर्षों में पहली बार आ रहे बलिदान शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का विधिवत शंखनाद किया। बरहज आश्रम के पीठाधीश्वर महंत आंजनेय दास जी महाराज ने संग्रहालय परिवार का आत्मीय स्वागत किया।

क्रांतिकारी विचारक अविनाश कुमार गुप्ता ने कहा कि महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए गोरखपुर कारागार में 19 दिसंबर, 1927 को अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। बिस्मिल जी के बलिदान शताब्दी वर्ष के प्रथम चरण में महुआ डाबर संग्रहालय परिवार द्वारा 17, 18 और 19 दिसंबर, 2026 को गोरखपुर में तीन दिवसीय "राष्ट्रीय स्मृति समारोह" का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें देश भर से क्रांतिकारी शहीदों के वंशज पधार रहे हैं।



डॉ. शाह आलम राना ने कहा, "रामप्रसाद बिस्मिल जी की समाधि पर संग्रहालय परिवार का आना-जाना दशकों से रहा है। बरहज आश्रम क्रांतिकारियों का सदैव से केंद्र रहा है, इसी कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उन दिनों आश्रम को तहस-नहस कर 'गैर-कानूनी' घोषित कर दिया था। बाबा राघवदास जी गोरखपुर जेल में बिस्मिल जी से निरंतर भेंट करने जाते थे। 19 दिसंबर, 1927 को राप्ती तट पर अंतिम संस्कार के समय बाबा राघवदास जी स्वयं उपस्थित थे। वे उनकी अस्थियों को खद्दर की चादर में लपेटकर बरहज आश्रम लाए और 20 दिसंबर, 1927 को प्रातः 8:30 बजे ताम्र-पात्र में रखकर आश्रम में ही यह समाधि स्थापित की। यही बिस्मिल जी की प्रथम और मूल समाधि है। इस समाधि की मिट्टी आज भी क्रांति की सुगंध देती है।"


समाधि पर नमन के पश्चात संग्रहालय परिवार ने शासन-प्रशासन से शताब्दी वर्ष को राष्ट्रीय महापर्व के रूप में ऐतिहासिक बनाने हेतु माँग की कि बरहज आश्रम स्थित रामप्रसाद बिस्मिल जी की समाधि परिसर में 'अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल बलिदान शताब्दी शिलालेख' का भव्य अनावरण किया जाए, जिस पर अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर रामप्रसाद बिस्मिल जी, बाबा राघवदास जी और बरहज आश्रम का गौरवशाली इतिहास अंकित हो। पर्यटन और संस्कृति विभाग द्वारा समाधि स्थल का भव्य सौंदर्यीकरण, टफन ग्लास प्रदर्शनी, नित्य दीपदान, सी.सी.टी.वी. सुरक्षा और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर स्वतंत्रता संग्राम सर्किट के पर्यटन मानचित्र पर अंकित किया जाए। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में रामप्रसाद 'बिस्मिल' शोध पीठ की स्थापना और सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्र को 'बिस्मिल स्वर्ण पदक' प्रदान किया जाए। आगामी 19 दिसंबर, 2026 को गोरखपुर जिला कारागार स्थित बिस्मिल जी के फाँसी-स्थल पर जिला प्रशासन द्वारा 21 गन-शॉट की शस्त्र-सलामी के साथ राजकीय सम्मान, पुष्पचक्र अर्पण और बरहज, गोंडा, अयोध्या, प्रयागराज की माटी के कलशों पर भारतीय वायुसेना द्वारा पुष्प-वर्षा कराई जाए। बलिदान शताब्दी पर 100 रुपये का स्मारक सिक्का, 5 रुपये का डाक टिकट और प्रथम दिवस आवरण जारी किया जाए। गोरखपुर जेल की पावन मिट्टी से देश भर में 100 स्थानों पर 'शताब्दी स्मारक उपवन' स्थापित किए जाएं, जिसकी प्रथम शुरुआत बरहज आश्रम से हो। शताब्दी वर्ष को 'अमर शहीद एकता वर्ष-2027' घोषित किया जाए, स्कूली पाठ्यक्रमों में बिस्मिल जी का जीवन-चरित्र जोड़ा जाए और शहीदों पर शोध हेतु 'शहीद छात्रवृत्ति' प्रारंभ की जाए। संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान सदन में चारों शहीदों - रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, अशफाकउल्ला खाँ और ठाकुर रोशन सिंह को सर्वदलीय श्रद्धा-सुमन अर्पित किए जाएं। रामप्रसाद बिस्मिल जी पर शोधपरक समग्र ग्रंथ प्रकाशित किया जाए और उनसे जुड़ी दुर्लभ तस्वीरों और दस्तावेजों की डिजिटल मेमोरियल आर्काइव / 3D-VR आर्काइव बनाई जाए तथा आकाशवाणी, दूरदर्शन और संसद टीवी पर नियमित कार्यक्रमों का प्रसारण हो।



महंत आंजनेय दास जी ने कहा कि महान बलिदानी रामप्रसाद बिस्मिल बलिदान शताब्दी समारोह को ऐतिहासिक और गौरवशाली बनाने के लिए देश-विदेश में बसे बिस्मिल-प्रेमियों के साथ गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क किया जाएगा। बरहज पीठाधीश्वर ने अपील करते हुए कहा कि शासन-प्रशासन और आमजन को शताब्दी वर्ष को यादगार बनाने के लिए हर तरह से सहयोग करना चाहिए, क्योंकि सौ वर्षों पर यह पावन अवसर आया है। हमें सचेत रहना होगा कि बिस्मिल जी की कीर्ति-रक्षा में कोई चूक न रह जाए। बरहज आश्रम इस शताब्दी समारोह में महुआ डाबर संग्रहालय के साथ सदैव खड़ा है।