भोपाल। ईमानदार और सख्त छवि के साथ फास्ट वर्कर के रूप में पहचानी जाने वाली आईएएस अफसर दीपाली रस्तोगी की पीएस एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग) में हुई पदस्थापना भले ही महत्वूपर्ण जिम्मेदारी हो, लेकिन तेजी से घटित घटनाक्रमों में यह पोस्टिंग कई मायने लिए हुए है। पिछली शिवराज सरकार (2013-2018) के दौरान दीपाली ने सचिव स्तर के पद आयुक्त आदिवासी विकास पर शानदार तीन साल का कार्यकाल पूरा किया। इसी दौरान उनके द्वारा ओडीएफ पर लिखा गया लेख राष्ट्रव्यापी चर्चा का विषय बना, फिर भी दीपाली के कद को कम नहीं किया गया, जबकि लोगों को इसकी प्रबल आशंका सिर्फ इसलिए थी कि ओडीएफ प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में शामिल है और उस पर किसी नौकरशाह द्वारा उंगली उठाना किसी एैरे-गैरे के बस की बात नहीं थी। सचिव से प्रमुख सचिव पद पर पदोन्नति के बाद भी दीपाली रस्तोगी को इसी विभाग में प्रमुख सचिव बना कर उनकी महत्वाकांक्षी योजनाओं को पूरा करने के लिए अवसर देना माना गया, जबकि सामान्यत: किसी अफसर को इतने लंबे समय तक एक ही विभाग में रखने का चलन नहीं है।
शिवराज सरकार की 2018 में रवानगी के समय दीपाली रस्तोगी आदिम जाति कल्याण विभाग में आयुक्त सह प्रमुख सचिव के रूप में पदस्थ होकर दोहरा कार्यभार संभालती रहीं । कमलनाथ सरकार के कार्यकाल (दिसंबर 2018 से मार्च 2020) में भी दीपाली रस्तोगी के विभाग और दोहरे प्रभार से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई, जबकि विभागीय मंत्री ओमकार सिंह मरकाम से पटरी नहीं बैठने की चर्चा गाहे बगाहे मंत्रालय के गलियारों में चलायमान रहती थीं। दो विपरीत सरकारों में महत्वपूर्ण दायित्व बचाए रखना दीपाली के रूतबे को बयां करता है। मार्च 2020 में शिवराज सरकार की अचानक वापसी से लेकर 30 मार्च 2020 तक सब कुछ ठीक रहते हुए 31 मार्च को आयुक्त, आदिवासी विकास पद पर बी. चन्द्रशेखर की अचानक पोस्टिंग हुई और 9 मई को दीपाली का विभाग बदलते हुए पीएस एमएसएमई के रूप में पदस्थ कर दिया गया।
दरअसल आदिम जाति कल्याण विभाग में दीपाली रस्तोगी की परफॉर्मेन्स बहुत अच्छी मानी गई। सूत्रों के अनुसार दीपाली अपनी पसंद और उत्साह से इस विभाग में काम कर रही थीं क्योंकि उनके द्वारा आदिवासी कन्या शिक्षा परिसर, एकलव्य आवासीय परिसर, एमपीटास पोर्टल, वनमित्र पोर्टल, एटीएम जैसे कई आदिवासी हितकारी महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए थे, जो सफलता के लगभग अंतिम चरण में थे। दीपाली के कार्यकाल में 3500 आदिवासी खिलाडि़यों की राष्ट्रीय प्रतियोगिता का सफलतापूर्वक आयोजन भोपाल में हो चुका था।
आखिर कौन सी घटनाएं हुईं, 30 मार्च से 9 मई के बीचलॉकडाउन में देश के विभिन्न राज्यों में फंसे मध्यप्रदेश के नागरिक, श्रमिक, विद्यार्थी, दर्शनार्थी और अन्य प्रोफेशनल्स की वापसी हेतु समन्वय कार्य करने के लिए गृह विभाग द्वारा 30 मार्च को जारी आदेश किया गया, जिसमें दीपाली रस्तोगी को महाराष्ट्र में फंसे प्रदेशवासियों की वापसी की जिम्मेदारी दी गई। इस सिलसिले में दीपाली ने 31 मार्च को विभाग के चुनिंदा 6 अफसरों को महाराष्ट्र के 6 संभागों के प्रकरणों के निराकरण हेतु ड्यूटी पर लगाया गया। इसके बाद 31 अप्रैल को दीपाली रस्तोगी ने महाराष्ट्र में फंसे लगभग 65000 प्रदेशवासियों की वापसी की कार्ययोजना मध्यप्रदेश के सभी कलेक्टरों को पालन करने के लिए भेजी। इसके 7 दिन बीत जाने के बाद कार्ययोजना पर अमल होने के पहले ही औरंगाबाद हादसा हो गया। दुर्भाग्य से हादसे में सभी मृतक और घायल मध्यप्रदेश के श्रमिक थे। हादसे के अगले दिन दीपाली का विभाग बदल दिया गया। ऐसे कोई विशेष कारण नहीं थे कि दीपाली का विभाग बदला जाता जबकि वर्तमान में विभागीय मंत्री भी महिला है।
मजदूरों की वापसी में चूक एक बड़ी वजहमहाराष्ट्र में फंसे मध्यप्रदेश के बाशिंदों से हेल्पलाइन नंबर पर प्राप्त मामलों के निबटारे के लिए दीपाली के 6 चुनिंदा अफसर कैसे काम कर रहे थे इसका आंकलन तो जांच के बाद ही हो सकेगा। महाराष्ट्र में परेशान और वापसी के आकांक्षी लोगों के मामले आते रहे, रूटीन सीएम हेल्पलाइन प्रकरणों की तरह निराकृत होते रहे, जबकि परेशान शिकायतकर्ताओं की स्थिति लगातार भयावह होती जा रही थी। 31 अप्रैल के आदेश अनुसार लगभग 2500 बसें महाराष्ट्र जाना थी, किंतु पालन नहीं हो पाया। दीपाली की ओर से काम करने वाले ऑल इज वेल और फीलगुड के एहसास में रहे और औरंगाबाद हादसा हो गया।
दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी और मीडिया की नाराजगीऔरंगाबाद हादसे पर कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और मीडिया को बताया कि मजदूरों की वापसी हेतु मुकर्रर प्रभारियों द्वारा उनके फोन नहीं उठाए जा रहे हैं। वहीं प्रदेश कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष और पूर्व मंत्री जीतू पटवारी ने इस मामले में महाराष्ट्र हेतु मुकर्रर प्रभारी आईएएस को तत्काल सस्पेंड करने और उनकी कॉल डीटेल निकलवाकर जांच कराने की मांग की। मीडिया इस मामले में पहले ही नाराज था क्योंकि उंगली पर गिनने लायक पत्रकारों को छोड़कर किसी भी बड़े या छोटे पत्रकारों के फोन कभी भी उठाए नहीं जाते रहे थे।
दहशत का वातावरण
दीपाली रस्तोगी

