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रोजे में दिखावा नहीं हैः मौलाना सामिद नदवी

बेगमगंज। माह रमजान वह पवित्र महीना है जिसमें पवित्र कुरआन उतारा गया। इसलाम के पांच रूक्न है तोहीद, नमाज, रोजा, जकात और हज सभी इबादतांे का सवाब खुदा ने देने का वायदा किया है आम दिनों में कोई नेक कार्य करोगें तो दस नेकियां मिलेंगी लेकिन रमजान में इसका प्रशित बढ़ा दिया जाता है। फर्ज पूरा करने पर 70 नेकियां नफिल नमाज पर फर्ज के बराबर सवाब दिया जाता है। लेकिन रोजा एक ऐसी इबादत है जिसका सवाब खुदा स्वयं देगा। उक्त उदगार मर्कज मस्जिद के पेश इमाम मौलाना शामिद खां नदवी ने रमजान के संबंध मंे जानकारी देते हुए उक्त बात बताते हुए रमजान के रोजांे के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होने बताया कि नमाज पड़ना, लोगो को खैरात देना, किसी की मदद करना, हज पर जाना इसमें दिखावा हो सकता है कुछ लोग दिखावे के लिए किसी की मदद कर सकते है लेकिन रोजा एक ऐसी इबादत है जिसमें दिखावा नहीं हैं रोजा सिर्फ खुदा को राजी करने के लिए रखा जाता है। नमाज में जब वुजु बनाते है तो कुल्ली करने के लिए मुंह मंे पानी लेते है लेकिन रोजेदार उसकी एक बूंद भी अपने हलक के अंदर नहीं उतारता जबकि उसे शिद्दत
की प्यास लगी होती है। यही तो रोजा है जिसमें दिखावा नहीं है। इसीलिए खुदा ने सारी इबादतों का सवाब तय कर दिया है लेकिन रोजे का बदला वह रोजेदार को स्वयं देगा जिसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता। उन्होने सभी लोगो से  झूठ बोलने, किसी की बुराई करने या गलत कार्य करने के लिए मना किया और कहा कि इससे रोजा खराब हो जाता है। रोजा सिर्फ भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है रोजा भूख प्यास के साथ आंखो का है जिससे कोई गलत चीज न देखें, कानों का रोजा है जिससे कोई गलत बात न सुने, पैरों का रोजा है गलत जगह पर न जाए, हाथों का रोजा है कोई गलत कार्य अपने हाथों से न करें। रोजा सब्र करने की नसीहत करता हैं और मजबूरों पर रहम करने की सीख देता है। उन्होने लोगो से इस बार की ईद सादगी से मनाने के लिए खरीदारी न करते हुए उस पैसे को अपने गरीब पड़ोसियों को देकर उनकी मदद करने का आव्हान किया।

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