इसके अलाबा पाकिस्तान के बलुचिस्तान में, नो दिन लगा रहता है भक्तो का तांता ,
बुद्धि नारायण शर्मा पीपुल्स संवाददाता बाड़ी।
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से नेशनल हाईवे क्रमांक 12 पर स्थित भोपाल से 100 किलोमीटर की दूरी पर मां हिंगलाज शक्तिपीठ मौजूद है जहां पर नवरात्रि में महानगरों के अलावा अन्य प्रदेशों और देश के कोने-कोने से आदमी आता है। क्योंकि भारत में पहला शक्तिपीठ मात्र एक स्थान है और दूसरा पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मौजूद।
बाड़ी में नवरात्रि पर्व शुरू होते ही प्रतिदिन रात 4 बजे से हजारों लोगो का जल चढ़ाने का सिलसिला लगातार 9 दिन तक चलता रहता है साथ ही 9 दिन तक हवन पूजन शतचंडी महायज्ञ का आयोजन लगातार चलता रहता है।
पहला विश्व में माँ हिंगलाज पाकिस्तान के प्रसिद्ध बिलुचिस्तान में माँ हिंगलाज ज्योति रूप में बिराजमान हैं। माँ के भक्त उन्हें नानी कहकर पुकारते हैं नानी के हज की प्रसिद्धि भारत में ही नही विश्व में फैली हुई है यानि नानी के हज की इक्छा रखने बाला मानव समय पूर्व ही माँ की कृपा का पात्र बन जाता है ज्योति रूप में माँ का स्वरूप काफी निराला हैं भक्तो की आँखों की ज्योति बनी नानी हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करती है।
दूसरा शक्ति पीठ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का भोजपुर विधान सभा क्षेत्र का ह्रदय स्थल बाड़ी के दुसरे छोर बाड़ी कला में विन्धयाचल की तल हटी में बसा हुआ है रामजानकी खाखी अखाडा मंदिर की बगिया में विराजमान ममता मई माँ हिंगलाज का मनमोहक दरबार लगा हुआ है खाकी अखाडा मंदिर की गादी पर विराजमान बिहंग महंत संत भगवान दास जी महाराज भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के परमभक्त थे जन पीड़ा और भक्तों के संकट को देखकर उनके मन में शक्ति उपासना की इक्छा जागृत हुई इस इक्छा को पूरी करने के लिए संत ने रात दिन चिंतन मनन किया संत को दुःखी देखकर मंदिर परिषर में उपासना करने बाले नागाओं के भीतर ब्याकुलता छा गई नागाओं को अपने मन की इक्छा बताकर संत ने वन गबन कर दिया कई दिनों तक घनघोर जंगलों में भटके और एक स्थान को देखकर धूनी रमा ली संत के दृढ़ विस्वास को देखकर महाशक्ति का आसन डगमगा गया माँ ने अपने भक्त की इक्छा पूरी करने के लिए अबोध बालिका का रूप धारण किया घनघोर जंगल में पत्तों की आबाज सुनकर संत ने नेत्र खोले तो अपने सन्मुख कन्या को देखकर आश्चर्यचकित रह गए छड़ मात्र में ही संत का ज्ञान जागृत हुआ और कन्या के चरण पकड़ लिए माँ ने अपने भक्त से मुझे पाने की इक्छा पूँछी तो तपस्वी संत ने जनकल्याण के लिए माँ से आशीर्वाद माँगा तब माँ ने जमीन से कंडी उठाकर उसमे अग्नि प्रकट की और संत के हाँथ में थमा दी और प्रत्यक्ष रूप से मेरे आकार की मूर्ती विस्थापित कर मूर्ती पूजन की आज्ञा दे दी संत भगवान दास जी महाराज माँ हिंगलाज को हांथी गेट के अंदर मंदिर परिषर में स्थापित करना चाहते थे लेकिन गेट के बाहर ही कंडी गिर जाने से माँ की ममता मई मूर्ती की स्थापना करदी जो आज भव्य मंदिर के रूप में जगजाहिर है इस मंदिर की कितबन्ति हैं जो माँ हिंगलाज के दर्शन के लिए भक्त जाते हैं बो आते जाते संत भगवान दास जी महाराज के जयकारे लगाते हैं कन्याएं शुशील बर पाने के लिए माँ के चरणों में एक फूल चढ़ाती हैं उनकी कामना पूरी होती है पुत्र प्राप्ति के लिए महिलाएं माँ के दरबार में उल्टा थापा लगाती हैं इक्छा पूर्ण होने पर सीधा थापा लगाया जाता है चैत्र एबं कुआंर की नवरात्रि में माँ का प्रिय भक्त आल्हा के आने की भी कथाएं बताई जाती हैं ।संत समाज के पटल से इस मंदिर की मनमोहक प्रस्तुति की हे जो बाड़ी नामक डायरी में प्रस्तुति हे उसके अंश इस प्रकार हैं संत बड़े परमार्थी जिनके शीतल अंग तपन भुजाएं और की दे देकर सत संग इस दरबार में जो भी भक्त पूरी आस्था से एक फूल माँ को अर्पण करता है उसकी हर मनोकामना को माँ पूरी करती हैं।


