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सफेद स्कर्ट विंबडलन-प्लेयर्स ही नहीं, छात्राओं के लिए भी मुसीबत

नई दिल्ली। विंबलडन को नई फीमेल चैंपियन मिली है। कजाकिस्तान की एलेना रिबाकिना ने शनिवार को ट्यूनीशिया की ओन्स जूबर को महिला सिंगल्स के फाइनल हराकर खिताब जीता। सफेद कपड़ों और हरी घास पर खेला जाने वाला टेनिस का यह टूर्नामेंट विम्बलडन इस बार 'वाइट ड्रेस कोड' को बदलने की मांग के लिए भी चर्चा में रहा। यह मांग महिला खिलाड़ियों की ओर से उठाई गई थी।

महीने के 'उन दिनों' में दाग लगने के डर से महिला खिलाड़ियों की परफॉर्मेंस भी प्रभावित होती है। विंबलडन के अलावा भी ताइक्वांडो टेस्ट क्रिकेट जैसे कई स्पोर्ट्स ऐसे हैं जिनमें सफेद स्कर्ट, ट्रैक सूट, ट्राउजर पहननी होती है। खेल के अलावा भारत में लड़कियों की स्कूल ड्रेस भी सफेद रंग की होती है, जिन्हें स्कूल बोर्ड तय करते हैं। पीरियड्स में सफेद सलवार या सफेद स्कर्ट के खराब होने का डर हमेशा बना रहता है।

महिला खिलाड़ियों को इस दौरान किन तकलीफों का सामना करना पड़ता है बता रही हैं मार्शल आर्ट की इंटरनेशनल प्लेयर सलोनी सिंह पुंडीर और मध्य प्रदेश, सीहोर की एथलीट मीना परमार। सलोनी ने बताया कि सफेद यूनिफॉर्म की वजह से खेल के दौरान उनके मन में ड्रेस पर दाग लगने का डर बना रहता है। कई बार वो अपनी साथी खिलाड़ी से भी पूछती हैं कि देख कर बता कहीं दाग तो नहीं लगा गया। हर समय एक अनजाना सा डर और संकोच बना रहता है। शुरुआत में तेज दर्द की वजह वो दो से तीन दिन की ट्रेनिंग मिस कर देती हैं। अगर खेल के दौरान पीरियड्स हों तो फाइनल मैच में पेन किलर लेकर खेलना पड़ता है।

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