भोपाल। "गांधी औरतों को उपवास करने और चरखा चलवाने वाली भूमिका बस में सीमित नहीं करते। उनकी औरतें हर स्तर पर उनसे बात करती है, लड़ती हैं नेतृत्व में आती हैं औरतों से जुड़े कानूनों में बदलाव की वकालत होती है, हर स्तर पर औरतों को प्रतिन्धित्व दिया जाता हैं। पर वे इसे आरक्षण या महिलावाद का नाम नहीं देते।" उपरोक्त विचार गांधी पर शोध करने वाले चिंतक और वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने सातवें महेश बुच स्मृति व्याख्यान में ' महात्मा की महिला शक्ति' विषय पर व्यक्त किया।
आधुनिक भोपाल के आर्किटेक्ट के रूप में पहचाने श्री एम एन बुच की स्मृति में यह व्याख्यान नरोन्हा प्रशासन अकादमी के सभागार में नेशनल सेन्टर फॉर ह्यूमन सेटलमेंट एंड एनवायरमेंट और फ्रेंड्स ऑफ एनवायरमेंट द्वारा आयोजित था।
अरविंद मोहन ने अपने व्याख्यान में गांधी जी द्वारा महिलाओं में नेतृत्व विकास और आजादी के आंदोलन में उनकी भूमिका पर विस्तृत जानकारी देते हुए आगे कहा कि औरतों को परदे से निकलना या धरने पर चुपचाप बैठे जाना भी कोई क्रांतिकारी काम हैं? यह कल्पना महत्मा गांधी ही कर सकते थे। जब गांधी ने नमक सत्याग्रह का फैसला किया तब महिलाओं पर तरह तरह की पाबंदी के बावजूद बीस हजार से ज्यादा महिलाओं ने गिरफ्तारी दी थी। आज तक किसी क्रांति, किसी आन्दोलन में एक साथ इतनी महिलाएं जेल नही गई हैं।
अगर हम बयालीस के आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व का हिसाब लगाए तो मामला बराबरी का ही होगा। कुल मिलाकर गांधी महिला और पुरुष अलग अलग नही देखते। उन्होंने दर्जनों महिलाओं का उल्लेख किया और बताया कि कैसे इन महिलाओं ने गांधी को गांधी बनाया। उन्हें गंगा ने चरखा चलाना सिखाया । दादा भाई नौरोजी की चार बेटियों, उमा बाई खांडेकर और दुर्गाबाई देशमुख सी सैकड़ों महिलाओं ने आजादी के आंदोलन गांधी से प्रेरणा लेकर भाग लिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश पुलिस की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और विचारक सुश्री अनुराधा शंकर सिंह करते हुए कहा कि आज के व्याख्यान में जो सूत्र दिए गए है। वह महत्त्वपूर्ण है, आने वाली पीढ़ी इसमें अपना रास्ता तलासेगी और गांधी से जुड़ेगी। उन्होंने जॉर्ज ऑरवेल को उद्धृत करते हुए कहा कि गांधी जी का जीवन एक तीर्थ यात्रा है। उन पर मां का प्रभाव ज्यादा था। उन्होंने अधिकारों के विषय में बात करते हुए कहा कि उन्होंने जो भी सीखा है अपनी निरक्षर मां के घुटनों पर बैठ कर सीखा, जिन्होंने आर्थिक कठिनाई में पाला। तीन महिलाओं मां, रंभा और कस्तूरबा ने उन्हें बनाया।
व्याख्यान के पूर्व श्री सारंग फगरे और उनके साथियों ने गांधी जी के प्रिय भजन राम धुन और ' वैष्णव जन ' का गायन किया। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों और विषेस कर युवाओं की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।



