- SRS-2024 में मध्यप्रदेश का IMR 35, राष्ट्रीय औसत 24; ग्रामीण क्षेत्रों में दर 37 — बालिकाओं की शिशु मृत्यु दर भी बालकों से अधिक
भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने प्रदेश में शिशु मृत्यु दर के चिंताजनक आंकड़ों को लेकर प्रदेश की भाजपा सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़े मध्यप्रदेश की वास्तविक तस्वीर सामने रख रहे हैं।
श्री पटवारी ने कहा कि भारत के महापंजीयक कार्यालय द्वारा जारी SRS Statistical Report 2024 के अनुसार मध्यप्रदेश में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 35 शिशुओं की मृत्यु हो रही है, जबकि राष्ट्रीय औसत 24 है। यानी मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से 11 अधिक है।
उन्होंने कहा कि यह अंतर सामान्य आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल है। जब देश में शिशु मृत्यु दर 24 तक पहुंच गई है, तब मध्यप्रदेश 35 पर क्यों बना हुआ है, इसका जवाब सरकार को देना चाहिए।
श्री पटवारी ने कहा कि SRS-2024 के आंकड़े प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों की और अधिक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर 37 प्रति 1,000 जीवित जन्म है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 28 है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी, समय पर रेफरल, नवजातों के लिए आपातकालीन उपचार और परिवहन जैसी व्यवस्थाओं की कमी का सीधा असर बच्चों की जान पर पड़ रहा है।
श्री पटवारी ने कहा कि प्रदेश में लैंगिक अंतर भी चिंता का विषय है। SRS-2024 के अनुसार मध्यप्रदेश में बालिकाओं की शिशु मृत्यु दर 36, जबकि बालकों की 35 प्रति 1,000 जीवित जन्म है।
उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बालिकाओं की मृत्यु दर बालकों से अधिक क्यों है और इसके पीछे स्वास्थ्य, पोषण तथा सामाजिक कारणों को दूर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
श्री पटवारी ने कहा कि NFHS-5 (2020-21) के आंकड़े भी मध्यप्रदेश में बाल स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति को सामने रखते हैं।
- नवजात मृत्यु दर (NMR) — 29.0 प्रति 1,000 जीवित जन्म
- शिशु मृत्यु दर (IMR) — 41.3 प्रति 1,000 जीवित जन्म
- पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) — 49.2 प्रति 1,000 जीवित जन्म
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर थी:
- NMR — 30.4
- IMR — 43.5
- U5MR — 52.5 प्रति 1,000 जीवित जन्म
श्री पटवारी ने कहा कि SRS और NFHS की कार्यप्रणाली अलग-अलग है, इसलिए इनके आंकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जानी चाहिए, लेकिन दोनों आधिकारिक स्रोत प्रदेश में शिशु एवं बाल स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चुनौती की ओर संकेत करते हैं।
सरकार से जीतू पटवारी के 6 सीधे सवाल
1. लक्ष्य और समय-सीमा क्या है?
मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर को राष्ट्रीय औसत 24 या उससे नीचे लाने के लिए सरकार ने क्या लक्ष्य और निश्चित समय-सीमा तय की है?
2. ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था कब सुधरेगी?
जब ग्रामीण मध्यप्रदेश में IMR 37 है, तो PHC और CHC में बाल रोग विशेषज्ञों, प्रशिक्षित स्टाफ और आवश्यक जीवनरक्षक उपकरणों की कमी कब तक पूरी की जाएगी?
3. SNCU और NBSU कितने प्रभावी हैं?
प्रदेश में संचालित SNCU और NBSU कितनी क्षमता के साथ संचालित हो रहे हैं? इनमें 24 घंटे प्रशिक्षित डॉक्टर एवं पैरामेडिकल स्टाफ की उपलब्धता कितनी है?
4. हाई-बर्डन जिलों के लिए क्या विशेष योजना है?
जिन जिलों में शिशु मृत्यु दर अधिक है, वहां मृत्यु के प्रमुख कारणों की पहचान कर सरकार ने कौन-सी विशेष कार्ययोजना लागू की है?
5. डेथ ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
नवजात एवं शिशु मृत्यु के मामलों में संक्रमण, कुपोषण, जटिल प्रसव, जन्म के समय कम वजन तथा उपचार में देरी जैसे कारणों की जिला-वार डेथ ऑडिट रिपोर्ट सरकार सार्वजनिक करेगी या नहीं?
6. जवाबदेही किसकी तय हुई?
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर लगातार बजट खर्च होने के बावजूद मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से 11 अधिक क्यों है? इस विफलता के लिए सरकार ने किस अधिकारी अथवा जिम्मेदार व्यवस्था की जवाबदेही तय की है?
श्री पटवारी ने कहा कि बच्चों की जान बचाना किसी सरकार के प्रचार का विषय नहीं, बल्कि उसका बुनियादी मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। केवल संस्थागत प्रसव की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रसव के बाद नवजात देखभाल, पोषण, संक्रमण नियंत्रण, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, समय पर रेफरल और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार को आंकड़ों को छिपाने या उपलब्धियों का प्रचार करने के बजाय जिला-वार वास्तविक स्थिति, शिशु मृत्यु के कारण और डेथ ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।
श्री पटवारी ने कहा कि मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से 11 अधिक होना सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है। सरकार को यह बताना होगा कि देश आगे बढ़ रहा है तो मध्यप्रदेश पीछे क्यों है और प्रदेश के बच्चों की जान बचाने के लिए सरकार की जवाबदेही कब तय होगी।