Type Here to Get Search Results !

फेसबुक पोस्ट में 13 दिसंबर 2005 से पहले के कब्जे की जांच और आदिवासियों को पट्टे देने की प्रक्रिया पर उठाए प्रश्न

भोपाल। व्हिसलब्लोअर और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता डॉ. आनंद राय ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की है। इसमें उन्होंने वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासियों को वनाधिकार पट्टे देने की प्रक्रिया और तत्कालीन सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।


डॉ. राय ने अपनी पोस्ट में लिखा कि वनाधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर काबिज पात्र आदिवासियों के दावों की जांच की जानी थी। उन्होंने कहा कि दावों के सत्यापन के लिए पांच वर्ष से रह रहे ग्रामीणों के पंचनामे और गूगल अर्थ इमेजरी जैसे साक्ष्यों की मदद ली जा सकती थी। उनके अनुसार, वनाधिकार पट्टे जारी करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी।

पोस्ट में डॉ. राय ने कोरसम गांव का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते बड़वानी जिले के बड़वानी, सेंधवा, पानसेमल और अन्य आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े वनाधिकार दावों पर क्या कार्रवाई हुई। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को संबोधित करते हुए पात्र आदिवासी परिवारों को वनाधिकार पट्टे नहीं मिलने के मुद्दे पर जवाबदेही तय करने की मांग उठाई।

डॉ. राय की यह पोस्ट वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन, पात्र आदिवासी परिवारों के दावों के सत्यापन और वन भूमि पर उनके अधिकारों से जुड़े सवालों को सामने लाती है। हालांकि, पोस्ट में उठाए गए आरोपों और संबंधित क्षेत्रों में वनाधिकार पट्टों की वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इस संबंध में राज्य सरकार या संबंधित विभाग का पक्ष सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।