इंटैंगल्स की स्टडी
- दिल्ली बड़ी चिंता बनकर उभरी, यहां हर 5 में से 4 स्कूल बसों में ओवर-स्पीडिंग दर्ज हुई। महाराष्ट्र में अचानक रफ्तार बढ़ाने के मामलों का हिस्सा राष्ट्रीय औसत से छह गुना रहा
- 116 स्कूल बसों में हर 2 से 3 दिन में ओवर-स्पीडिंग दर्ज हुई। ऐसे मौकों पर इनकी औसत रफ्तार 79 किमी प्रति घंटा रही, जबकि तय सीमा 40 किमी प्रति घंटा है
New Delhi :, 21 अक्टूबर 2026: एआई आधारित प्रिस्क्रिप्टिव एनालिटिक्स कंपनी इंटैंगल्स ने भारत में स्कूल बसों की सुरक्षा पर एक स्टडी जारी की है। इंटैंगल्स एक वैश्विक कंपनी है, जो कमर्शियल फ्लीट और मोबिलिटी एनालिटिक्स के क्षेत्र में काम करती है। स्टडी के मुताबिक देश के 61 शहरों में जिन स्कूल बसों का विश्लेषण किया गया, उनमें से हर पांच में से एक बस में कम से कम एक बार ओवर-स्पीडिंग दर्ज हुई। देश भर की 598 स्कूल बसों के ड्राइविंग पैटर्न की जांच में अलग-अलग इलाकों के बीच बड़ा फर्क सामने आया। दिल्ली में जांची गई हर पांच में से चार स्कूल बसों में ओवर-स्पीडिंग दर्ज हुई, जबकि देश भर में यह आंकड़ा पांच में से एक का रहा। महाराष्ट्र भी चिंता बढ़ाने वाले राज्य के रूप में सामने आया, जहां अचानक रफ्तार बढ़ाने के मामलों का हिस्सा राष्ट्रीय औसत से छह गुना रहा।
ये नतीजे इंटैंगल्स की नई स्टडी ‘इंटरेस्टिंग एंगल्स, एपिसोड 2: बियॉन्ड द रूलबुक’ का हिस्सा हैं। इसमें 2026 के छह महीनों के दौरान 598 स्कूल बसों में दर्ज ड्राइविंग से जुड़े 75,000 से ज्यादा मामलों का विश्लेषण किया गया। स्टडी में ड्राइविंग के चार तरह के व्यवहार परखे गए: ओवर-स्पीडिंग, अचानक ब्रेक लगाना, अचानक रफ्तार बढ़ाना और कोस्टिंग। मकसद उन खतरों को पहचानना था, जो स्कूल बसों की आम सुरक्षा जांच में शायद पकड़ में न आएं। स्टडी में ऐसी 116 स्कूल बसें भी मिलीं, जिनमें हर दो से तीन दिन में ओवर-स्पीडिंग दर्ज हुई। ऐसे मौकों पर इन बसों की औसत रफ्तार करीब 79 किमी प्रति घंटा रही, जो तय सीमा से काफी ज्यादा है। ये नतीजे बताते हैं कि अनिवार्य स्पीड गवर्नर और आम जीपीएस ट्रैकिंग के अलावा ड्राइविंग के तरीके पर लगातार नजर रखना भी जरूरी है।
विश्लेषण में स्कूल बसों और सिटी बसों में ड्राइविंग से जुड़े अलर्ट की तुलना भी की गई। दोनों के ड्राइविंग व्यवहार और उससे जुड़े सुरक्षा मामलों में बड़ा फर्क नजर आया।
ड्राइविंग व्यवहार
| स्कूल बसें
| सिटी बसें
| तुलनात्मक अंतर
|
अचानक रफ्तार बढ़ाना
| 4.6% | 1.8% | 4 गुना |
अचानक ब्रेक लगाना
| 81.5% | 38.9% | 3 गुना |
कोस्टिंग
| 2.9% | 0.4% | 9 गुना |
*कृपया ध्यान दें: ये तुलनाएं हर वाहन श्रेणी के भीतर अलर्ट के बंटवारे को दिखाती हैं। इनसे यह पता नहीं चलता कि हर सफर में कितने मामले हुए।
अचानक ब्रेक लगाना सबसे आम व्यवहार निकला। दर्ज हुए कुल सुरक्षा मामलों में इसका हिस्सा 81.5% रहा। छह महीनों में हर स्कूल बस में औसतन 126 मामले दर्ज हुए, जिनमें करीब 103 बार अचानक ब्रेक लगाया गया। यानी लगभग हर दो स्कूली दिनों में एक बार। स्टडी में एक पैटर्न सामने आया, जिसे उसने ‘बेल इफेक्ट’ नाम दिया है। सभी इलाकों में सुबह 7 से 8 बजे के बीच, जब बच्चे स्कूल जाते हैं, अचानक ब्रेक लगाने के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं। स्कूल खुलने के समय इन मामलों का इस तरह बढ़ना कई सवाल खड़े करता है। इसमें ट्रैफिक जाम, टाइट शेड्यूल और घंटी बजने से पहले स्कूल पहुंचने के दबाव की कितनी भूमिका है? स्टडी इसका कोई सीधा कारण साबित नहीं करती। फिर भी हर जगह दिखने वाला यह पैटर्न इशारा करता है कि स्कूल परिवहन की सुरक्षा पर विचार करते समय ड्राइवर के अपने व्यवहार के साथ कामकाज से जुड़े दबावों को भी ध्यान में रखना होगा।
अलग-अलग इलाकों में ड्राइविंग के तौर-तरीकों में भी साफ फर्क दिखा। रिपोर्ट की क्षेत्रीय तुलना में महाराष्ट्र में दर्ज मामलों में अचानक रफ्तार बढ़ाने का हिस्सा 30% रहा, जो 5% के राष्ट्रीय औसत का छह गुना है। राज्य के भीतर पुणे में यह हिस्सा 42% रहा, जबकि मुंबई में 15%। इन आंकड़ों से लगता है कि आक्रामक ढंग से रफ्तार बढ़ाने के पैटर्न को शायद अकेले ट्रैफिक जाम से नहीं समझा जा सकता। इसलिए ड्राइवरों के व्यवहार और बसें चलाने के हालात को करीब से परखने की जरूरत है।
इंटैंगल्स के सीईओ अनूप पाटिल ने कहा, “स्कूल बस की सुरक्षा को अक्सर इस बात से आंका जाता है कि गाड़ी तय नियमों पर खरी उतरती है या नहीं, जैसे स्पीड गवर्नर, जीपीएस ट्रैकिंग और बस में लगे सुरक्षा उपकरण। लेकिन नियमों के पालन से यह नहीं पता चलता कि बच्चे को कितने सुरक्षित ढंग से ले जाया जा रहा है। हमारे विश्लेषण में स्कूल बसों में ओवर-स्पीडिंग और अचानक ब्रेक लगाने के मामले लगातार सामने आते रहे। इनमें से कुछ तो रोज के सफर में बार-बार हो रहे थे। उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि ये मामले किन हालात में होते हैं।”
इंटैंगल्स के चीफ एआई साइंटिस्ट विक्रम मेलापुडी ने कहा, “स्कूलों और सुरक्षा अधिकारियों को सड़क पर असल ड्राइविंग की बेहतर जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे बार-बार सामने आने वाले खतरों को पहचान सकें, असुरक्षित आदतों पर रोक लगा सकें और ड्राइवरों की जवाबदेही मजबूत कर सकें। अब तक ज्यादा जोर यह देखने पर रहा है कि बस नियमों के मुताबिक है या नहीं। अब ध्यान इस पर होना चाहिए कि बस असल में कितने सुरक्षित ढंग से चलाई जा रही है और इसका आकलन लगातार होता रहे।”
ये नतीजे ऐसे समय आए हैं, जब स्कूल परिवहन की सुरक्षा से जुड़े नियम बदल रहे हैं। महाराष्ट्र में जुलाई 2026 के नियमों में सीट बेल्ट, सीसीटीवी, लाइव वीडियो एक्सेस, जीपीएस ट्रैकिंग, पैनिक बटन, डिजिटल अटेंडेंस और राज्य की निगरानी व्यवस्था से जुड़ाव जैसे अतिरिक्त उपाय शामिल किए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर 2026 से 2028 के बीच नई बनने वाली बसों और ट्रकों में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (एडीएएस) भी चरणबद्ध तरीके से लगाए जा रहे हैं। लेकिन स्कूल परिवहन में पुरानी गाड़ियां भी चलती रहेंगी, इसलिए स्टडी मौजूदा बसों में ही सुरक्षा के तौर-तरीके मजबूत करने पर जोर देती है।
इंटैंगल्स का कहना है कि ड्राइविंग व्यवहार की निगरानी, असल सफर का डेटा, कैमरे और ड्राइवरों की व्यवस्थित ट्रेनिंग से स्कूल और फ्लीट ऑपरेटर असुरक्षित ड्राइविंग के पैटर्न पहचान सकते हैं और उन्हें सुधारने के कदम उठा सकते हैं। इन क्षमताओं को मौजूदा सुरक्षा नियमों के साथ जोड़ने से जवाबदेही बढ़ सकती है और स्कूल परिवहन के रोज के कामकाज पर बेहतर नजर रखी जा सकती है।
स्टडी का तरीका
स्टडी में जनवरी से जुलाई 2026 के बीच देश के 61 शहरों में चल रही 598 स्कूल बसों के असल डेटा का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में इसे छह महीने की विश्लेषण अवधि बताया गया है। अपने खुद के विकसित किए प्लेटफॉर्म और एल्गोरिदम की मदद से इंटैंगल्स ने चार मुख्य पैमानों पर दर्ज 75,000 से ज्यादा ड्राइविंग मामलों की जांच की। ये पैमाने हैं: ओवर-स्पीडिंग, अचानक ब्रेक लगाना, अचानक रफ्तार बढ़ाना और कोस्टिंग, यानी न्यूट्रल गियर में या इंजन बंद करके गाड़ी चलाना। ड्राइविंग के पैटर्न समझने के लिए इन मामलों की संख्या, समय और भौगोलिक बंटवारे का आकलन किया गया। स्कूल बसों में दर्ज सुरक्षा मामलों और अलर्ट के अनुपात की तुलना सिटी बसों से भी की गई। नतीजे विश्लेषण में शामिल वाहनों पर आधारित हैं और स्टडी के सैंपल में दिखे ड्राइविंग व्यवहार को दर्शाते हैं।
इंटैंगल्स के बारे में
इंटैंगल्स प्रिस्क्रिप्टिव एआई की एक वैश्विक कंपनी है, जो फ्लीट और मोबिलिटी ऑपरेटरों को दूर की सोच के साथ अपने वाहनों का प्रबंधन करने में मदद करती है। इसका प्लेटफॉर्म वाहनों के असल डेटा को आगे की तस्वीर दिखाने वाली इंटेलिजेंस में बदलता है। इससे फ्लीट ऑपरेटर दिक्कतों को जल्दी पकड़ पाते हैं, प्रिस्क्रिप्टिव एनालिटिक्स और गाइडेड रिपेयर के जरिए खराबियों को रोक पाते हैं और परफॉर्मेंस बेहतर कर पाते हैं। वे खराबी आने पर प्रतिक्रिया देने की जगह पहले से तैयारी करके काम कर पाते हैं, जिससे वाहनों की टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (कुल स्वामित्व लागत) घटाने में मदद मिलती है। मोबिलिटी जैसे-जैसे ज्यादा कनेक्टेड और जटिल हो रही है, इंटैंगल्स ऐसी इंटेलिजेंस लेयर तैयार कर रही है, जो फ्लीट को ज्यादा भरोसे, विश्वसनीयता और नियंत्रण के साथ चलाने में मदद करती है।
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