वसंत पंचमी के अवसर पर धार के भोजशाला में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। भोजशाला को दुल्हन की तरह सजाया गया है। भोजशाला में हवन पूजन चल रहा है लोग दर्शनों के लिए भोजशाला पहुंच रहे हैं। प्रशासन द्वारा सुरक्षा को लेकर विशेष इंतजाम किए गए हैं।
रविवार को वसंत पंचमी के अवसर पर सुबह 10 बजे उदाजी राव चौराहे से शोभायात्रा निकली जो नगर के मुख्य मार्गो से होती हुई दोपहर लगभग 12 बजे भोजशाला पहुंची। यहां पर मां सरस्वती की महाआरती के बाद धर्म सभा का आयोजन किया गया। इस धर्म सभा को परमहंस अवधेश पुरी, साध्वी सरस्वती के अलावा अन्य वक्ताओं द्वारा संबोधित किया गया।
आखिर क्या है भोजशाला का इतिहास
- कहते हैं कि राजा भोज देवी सरस्वती के उपासक थे। उन्होंने धार में 1034 ईस्वी में भोजशाला के रूप में एक भव्य पाठशाला बनवाकर उनकी प्रतिमा स्थापित की।
- कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को ध्वस्त कर दिया।बाद में दिलावर खां गौरी ने 1401 ईस्वी में भोजशाला के एक भाग में मस्जिद बनवा दी।
- 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने शेष भाग पर भी मस्जिद बनवा दी।अंग्रेजी राज से यहां विवाद की स्थिति बन गई, जो आजादी के बाद लगातार तेज होती गई। वसंत पंचमी को हिन्दू भोजशाला के गर्भगृह में सरस्वतीजी का चित्र रखकर पूजन करते हैं।
- 1909 में धार रियासत द्वारा 1904 के एशिएंट मोन्यूमेंट एक्ट को लागू कर धार दरबार के गजट जिल्द में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया।
- बाद में भोजशाला को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के पास इसकी देखरेख का जिम्मेदारी है।
- धार स्टेट ने ही 1935 में परिसर में शुक्रवार को नमाज पढने की अनुमति दी थी। पहले भोजशाला शुक्रवार को ही खुलती थी और वहां नमाज हुआ करती थी।
- 2003 से व्यवस्था में कुछ बदलाव किए गए जिसके तहत हर मंगलवार और बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिन्दुओं को पूजा की अनुमति और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई।
- वहीं बाकि के पांच दिनों में भोजशाला पर्यटकों के लिए यह खुली रहती है।
कब क्या हुआ
1995 में हुए विवाद के बाद से यहां मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढऩे की अनुमति दी गई। 12 मई 1997 को कलेक्टर ने भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया, और मंगलवार की पूजा पर रोक लगा दी गई। हिन्दुओं को बसंत पंचमी पर और मुसलमानों को शुक्रवार को 1 से 3 बजे तक नमाज पढऩे की अनुमति दी गई। ये प्रतिबंध 31 जुलाई 1997 को हटा दिया गया।
1995 में हुए विवाद के बाद से यहां मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढऩे की अनुमति दी गई। 12 मई 1997 को कलेक्टर ने भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया, और मंगलवार की पूजा पर रोक लगा दी गई। हिन्दुओं को बसंत पंचमी पर और मुसलमानों को शुक्रवार को 1 से 3 बजे तक नमाज पढऩे की अनुमति दी गई। ये प्रतिबंध 31 जुलाई 1997 को हटा दिया गया।
6 फरवरी 1998 को केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने आगामी आदेश तक प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया। 2003 में मंगलवार को फिर से पूजा करने की अनुमति दी गई। बगैर फूल-माला के पूजा करने के लिए कहा गया। पर्यटकों के लिए भी भोजशाला को खोला गया।18 फरवरी 2003 को भोजशाला परिसर में सांप्रदायिक तनाव के बाद हिंसा फैली।
2013 में भी बसंत पंचमी और शुक्रवार एक दिन आने पर धार में माहौल बिगड़ गया था। हिन्दुओं के जगह छोड़ने से इनकार करने पर पुलिस को हवाई फायरिंग और लाठीचार्ज करना पड़ा था। इसके बाद माहौल बिगड़ गया।इसके बाद साल साल 2016 में भी शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी पड़ने से यहां तनाव का माहौल बन गया था।
दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे
हिन्दू संगठन जहां भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस हिन्दू समाज का अधिकार बताते हुए इस सरस्वती का मंदिर मानते हैं। हिन्दुओं का तर्क है कि राजवंश काल में यहां मुस्लिमों को कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समाज का कहना है कि वे सालों से यहां नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्जिद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं।
हिन्दू संगठन जहां भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस हिन्दू समाज का अधिकार बताते हुए इस सरस्वती का मंदिर मानते हैं। हिन्दुओं का तर्क है कि राजवंश काल में यहां मुस्लिमों को कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समाज का कहना है कि वे सालों से यहां नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्जिद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं।
