हॉकी पत्रकारिता के 26 वर्षों के अनुभव ने मुझे एक बात सिखाई है—भारत में आम हॉकी प्रेमी को जीत चाहिए, लेकिन हॉकी व्यवस्था के भीतर क्या चल रहा है, इसकी चिंता बहुत कम लोगों को है!जब भारत जीतता है, तो जश्न मनता है। मलेशिया को हरा दिया, तो वाहवाही! एशियन गेम्स, एशिया कप या एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में पदक मिल गया, तो सब कुछ शानदार दिखाई देने लगता है।क्या सिर्फ जीत का स्कोर जानना ही हॉकी की समझ है?
लेकिन ठहरिए! क्या सिर्फ जीत का स्कोर भारतीय हॉकी की असली तस्वीर बता सकता है?
क्या हर जीत यह साबित करती है कि हॉकी का प्रशासन, जमीनी ढाँचा, स्कूल-कॉलेज हॉकी, प्रतिभाओं की खोज और खिलाड़ियों का भविष्य भी सुरक्षित है?
नीदरलैंड जैसी विश्वस्तरीय टीम के खिलाफ मुकाबले और जापान जैसी टीम के खिलाफ मुकाबले की चुनौतियाँ एक जैसी नहीं होतीं। हर टूर्नामेंट का स्तर, हर प्रतिद्वंद्वी की क्षमता और हर जीत का महत्व अलग होता है। इन अंतरों को समझे बिना भारतीय हॉकी की वास्तविक प्रगति का आकलन कैसे होगा?
दुख की बात यह है कि आम प्रशंसक को अक्सर सिर्फ स्कोर दिखाई देता है, जबकि हॉकी के जानकार को उस स्कोर के पीछे की पूरी कहानी भी देखनी चाहिए।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारत जीता या हारा। सवाल यह भी है—भारतीय हॉकी आगे बढ़ रही है या केवल कुछ नतीजों के सहारे अपनी सफलता का जश्न मना रही है?अगर भारत जीत रहा है, तो अच्छी बात है। खिलाड़ियों को सलाम! लेकिन क्या देश के हर हिस्से में नए खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं? क्या स्कूलों और कॉलेजों में हॉकी मजबूत हो रही है? क्या प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को उचित अवसर मिल रहे हैं? क्या हॉकी प्रशासन पारदर्शी, जवाबदेह और दूरदर्शी है?
इन सवालों को पूछना भारतीय टीम का विरोध नहीं, बल्कि भारतीय हॉकी के प्रति सच्ची निष्ठा है।
याद रखिए—टीम की जीत पर खुश होना देशभक्ति है, लेकिन व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाना भी हॉकी के प्रति जिम्मेदारी है!
जो प्रशंसक केवल जीत का स्कोर देखकर खुश हो जाता है, उससे हॉकी व्यवस्था की अंदरूनी कमियों के खिलाफ आवाज उठाने की उम्मीद करना आसान नहीं। व्यवस्था में बदलाव के लिए केवल भावनाएँ नहीं, जागरूकता, साहस और लगातार सवाल पूछने की प्रतिबद्धता चाहिए।
अब वक्त है स्कोरबोर्ड से आगे देखने का!
हमें सिर्फ जीतने वाली टीम नहीं, मजबूत हॉकी व्यवस्था भी चाहिए। हमें सिर्फ पदक नहीं, ऐसी नींव चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों को भी विश्व विजेता बना सके।
मेरी 26 वर्षों की हॉकी पत्रकारिता का संदेश स्पष्ट है—जीत का जश्न मनाइए, खिलाड़ियों का सम्मान कीजिए, लेकिन हॉकी व्यवस्था से सवाल पूछना कभी मत छोड़िए!
आप बताइए—क्या भारत की जीत ही भारतीय हॉकी व्यवस्था के सही होने का प्रमाण है, या जीत के साथ व्यवस्था की जवाबदेही भी जरूरी है?
अपनी राय कमेंट में जरूर लिखिए। इस आवाज को हॉकी प्रेमियों तक पहुँचाइए।
हॉकी बचेगी, तभी हॉकी का भविष्य बचेगा!
