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भगवत्प्राप्ति के लिए बाहरी नहीं, मन की शरणागति आवश्यक : सुश्री धामेश्वरी देवी

इंदौर। “भगवान की शरणागति केवल पूजा-पाठ की क्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि मन और बुद्धि से होनी चाहिए।” यह विचार जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका *सुश्री धामेश्वरी देवी* ने अपनी दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के चौथे दिन व्यक्त किए। प्रवचन दिव्य शक्ति पीठ, MR-10 रोड, BRTS मंदिर परिसर, इंदौर* में प्रतिदिन शाम *7 से 9 बजे* आयोजित हो रहे हैं।


सुश्री धामेश्वरी देवी ने कहा कि भगवान की कृपा के लिए शास्त्रों में बताई गई शरणागति ही वह साधन है, जिसे अनेक संत-महापुरुषों ने अपनाकर भगवत्प्राप्ति की। उन्होंने कहा कि हाथों से माला फेरना, वाणी से पाठ करना या तीर्थों में जाना तभी सार्थक है, जब मन भी भगवान की ओर हो। मनुष्य का मन यदि संसार, रिश्तों और सांसारिक सुखों में आसक्त है, तो केवल इंद्रियों से की गई भक्ति अपेक्षित फल नहीं देती।

सुश्री धामेश्वरी देवी ने कहा कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं, जबकि भगवान से प्राप्त आनंद स्थायी है। इसलिए साधक को निरंतर अभ्यास के माध्यम से मन को संसार से हटाकर भगवान में लगाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार से वास्तविक विरक्ति के लिए पहले उसके वास्तविक स्वरूप को समझना आवश्यक है।



प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि मन ही बंधन और मुक्ति दोनों का कारण है, इसलिए आध्यात्मिक साधना में मन की शरणागति को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने घोषणा की कि अगले प्रवचन में “संसार का वास्तविक स्वरूप क्या है?” इस विषय पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

प्रवचन का समापन श्री राधा-कृष्ण भगवान की आरती के साथ हुआ।