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पेंच से पुर्नस्थापित बाघ टी-3 बन गया मिस्टर पन्ना

अरुण सिंह, पन्ना.
 
पांच साल में मप्र के पन्ना टाइगर रिजर्व ने देश और दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इन पांच सालों में यहां जो कुछ हुआ उसे देखकर दुनिया भर के वन्य जीव प्रेमी उत्साहित और हतप्रभ हैं। वर्ष 2009 में बाघों से उजड़ चुका पन्ना टाइगर रिजर्व फिर बाघों से आबाद हो चुका है और यह करिश्मा पेंच से पन्ना लाये गये नर बाघ टी - 3 ने कर दिखाया है, जिसे अब मिस्टर पन्ना के नाम से जाना जाता है। इतिहास रचने वाले इस बाघ को पांच वर्ष पूर्व 26 दिसम्बर 2009 को पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की वंश वृद्धि के लिए छोंड़ा गया था, इसलिए यह दिन पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के लिए एक चिर स्मरणीय दिन है। 


पन्ना टाईगर रिजर्व को आबाद करने वाला मिस्टर पन्ना बाघ टी-3
पन्ना टाईगर रिजर्व को आबाद करने वाला मिस्टर पन्ना बाघ टी-3
पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के पांच वर्ष हुए पूरे 

बाघों की नई दुनिया आबाद करके रच दिया इतिहास
 


उल्लेखनीय है कि पन्ना में बाघों की नई दुनिया आबाद करने के लिए 7 नवम्बर 2009 को पेंच टाइगर रिजर्व से नर बाघ टी - 3 को यहां लाया जाकर इन्क्लोजर में रखा गया। बाड़े में कुछ दिन रखने के बाद 13 नवम्बर को खुले जंगल में स्वच्छन्द विचरण के लिए छोंड़ दिया गया। मालूम हो कि बाघ टी - 3 को पन्ना लाये जाने से पूर्व कान्हा व बांधवगढ़ से दो बाघिनों को लाया जाकर टाइगर रिजर्व के जंगल में छोंड़ दिया गया था ताकि नर बाघ के संपर्क में आकर दोनों बाघिन वंशवृद्धि कर सकें। लेकिन नर बाघ की मुलाकात इन बाघिनों से नहीं हो सकी और 27 नवम्बर को पेंच का यह बाघ पन्ना से अपने घर पेंच की तरफ कूच कर गया। पूरे 30 दिनों तक यह बाघ कड़ाके की ठंड में अनवरत यात्रा करते हुए 442 किमी की दूरी तय कर डाली। जिसे 25 दिसम्बर को पकड़ लिया गया और 26 दिसम्बर को दुबारा पन्ना टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया। 

बाघ द्वारा विचरण के दौरान खोजे गए कॉरीडोर का मानचित्र
बाघ द्वारा विचरण के दौरान खोजे गए कॉरीडोर का मानचित्र
पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर. श्रीनिवास मूर्ति बताते हैं कि टी - 3 पेंच से लाया गया वह नर बाघ है जो एक तरह से पुन: स्थापित बाघों के कुनबा का पिता है। बाघ टी - 3 के 30 दिनों की यात्रा का स्मरण करते हुए श्री मूर्ति बताते हैं कि ये दिन हमारे लिए बेहद चुनौतीपूर्ण व महत्व के थे, क्यों कि इसी नर बाघ पर पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना का भविष्य टिका हुआ था। इन 30 दिनों में टी - 3 ने बाघ आवास व उनके जीवन के बारे में पन्ना टाइगर रिजर्व की टीम व पूरे देश को इतना ज्ञान दिया जो अन्यत्र संभव नहीं था। यह बाघ पन्ना के दक्षिणी दिशा में छतरपुर, सागर एवं दमोह जिलों में विचरण करते हुए 442 किमी। की यात्रा की। जिस इलाके में बाघ विचरण कर रहा था वह पूरी तरह असुरक्षित था और शिकार हो जाने की प्रबल संभावना थी। लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी और कडाके की ठंड में नदी, नाले व जंगल पार करते हुए उक्त बाघ को सुरक्षित तरीके से फिर से बेहोश करते हुए पन्ना टाइगर रिजर्व में मुक्त किया। बाघ टी - 3 की इस खोज ने ही पन्ना टाइगर रिजर्व के प्रबंधन को एक टीम का रूप दिया। अपनी इस यात्रा में बाघ प्रतिदिन 15 से 50 किमी। तक चला, जिस जगह शिकार करता वहां तीन से चार दिन तक रूकता। इस यात्रा के दौरान चार भारतीय वन अधिकारियों ने बाघ टी - 3 का पीछा करने वाली टीम का नेतृत्व किया। टीम में 70 वनकर्मी, चार हांथी व 25 वाहन शामिल रहे। बाघ ने केन, सुनार, बेबस और व्यारमा जैसी नदियों को तैरकर पार किया। 

पांच साल में जन्मे 32 से अधिक बाघ शावक
पन्ना बाघ पुर्नस्थापनायोजना के इन पांच सालों में 32 से भी अधिक बाघ शावकों का जन्म हुआ। इन जन्मे बाघ शावकों में 6 की मृत्यु हो गई तथा 7 बाघ यहां पल बढकÞर बाहर निकल गये और बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जंगलों में स्वच्छन्द विचरण कर रहे हैं। क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति के मुताबिक मौजूदा समय पन्ना टाइगर रिजर्व में 22 बाघों का कुनबा है। आपने बताया कि बाघ टी-3 ने अपने 30 दिन की बाहरी यात्रा में पन्ना टाइगर रिजर्व एवं नौरादेही के कॉरीडोर को खोज निकाला। यहां जन्मे एक अन्य बाघ पन्ना-212 ने इतिहास रचते हुए पन्ना-बांधवगढ़-संजय टाइगर रिजर्व के कॉरीडोर की खोज की तथा संजय टाइगर रिजर्व में बाघिन के साथ जोड़ा बनाकर पिता का दर्जा भी हासिल किया। पन्ना की बाघ पुर्नस्थापना योजना को मिली उल्लेखनीय सफलता के लिए श्री मूर्ति ने स्थानीय लोगों से मिले सहयोग को भी अहम बताया और कहा कि जन सहयोग के बिना इतना बड़ा कार्य संभव नहीं था।