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आंबेडकर विश्वविद्यालय में अब ट्रांसजेंडर्स पर होगा शोध


महू। डॉ. आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विवि में अब एक बेहद संवेदनशील विषय पर शोध किया जाएगा। यह शोध ट्रांसजेंडर्स को भारतीय समाज में व्यावहारिक तौर पर शामिल करने को लेकर है जिस पर विवि में दो वर्षों तक शोध किया जाएगा। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएसएसआर ने इस शोध का चयन पोस्ट डॉक्टरेट फेलोशिप के लिए किया है। विवि की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला के नेतृत्व में डॉ. अस्मिता राजुरकर यह शोध करेंगी।

पिछले दिनों आंबेडकर विवि के एक शोध का चयन यूजीसी के स्ट्राइड कार्यक्रम में हुआ है तो वहीं अब आईसीएसएसआर ने एक अन्य शोध को चुना है। इसमें ट्रांस जेंडर्स या थर्ड जेंडर्स को समाज की मुख्यधारा में लाकर उनकी स्वीकारोक्ति पर शोध किया जाएगा।

जहां कोई स्त्री या पुरुष किसी ट्रांस जेंडर्स के साथ वैवाहिक संबंध में रहकर कैसे समाज में स्वीकारा जा सकता है। यह शोध अपने आपमें बेहद खास है, क्योंकि इसके नतीजे आने वाले समय में ट्रांस जेंडर्स को समाज में अलग-थलग पड़ने की बजाए उनके लिए एक बेहतर परिवार बनाने में कारगर साबित होंगे।

लिंग भेद, महिलाओं की सामाजिक स्थिति और ट्रांस जेंडर्स जैसे बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दों की जानकार और इन पर लंबे समय से शोध कर रहीं विवि की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला बताती हैं कि किसी भी स्त्री रूपी ट्रांस जेंडर का किसी पुरुष के साथ विवाह दरअसल उनकी आपसी सहमति, व्यक्तिगत और पारिवारिक सामंजस्य के साथ शुरू होता है और बाद में यह सामाजिक स्वीकार्यता तक पहुंचता है जो कि बहुत सामान्य नहीं है।

ये दो मनुष्य विवाह नाम की संस्था से होकर एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं और इस दौरान वे परिवार का हिस्सा होकर सामान्य जीवन भी जीते हैं। विवि में किए जा रहे इस शोध में सामान्य मनुष्य और एक ट्रांस जेंडर मनुष्य के मिलने, करीब आने और विवाह तथा उसके बाद की पूरी प्रक्रिया के दौरान सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक स्थितियों पर शोध किया जाएगा।

इसके अलावा इस तरह के विवाहों में कानूनी जटिलताओं को भी समझा जाएगा। प्रो. शुक्ला के मुताबिक अब ट्रांस जेंडर्स को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए काफी प्रयास हो रहे हैं। इसका एक बेहद शानदार उदाहरण छत्तीसगढ़ में इसी वर्ष हुआ एक विवाह सम्मेलन भी है। विवि में हो रहे इस शोध के दौरान बड़ी संख्या में अलग-अलग विषयों और स्थितियों पर आंकड़े जुटाए जाएंगे।