"दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वफ़ा आएगी"
अरुण शुक्ल, नई दिल्ली। देश के दुश्मनों को मार गिराने की जिद्द चट्टानों से भी ज्यादा मजबूत हौसला हर सांस व रक्त की हर बूंद देश सेवा के लिए समर्पित देश के ही ऐसे जांबाजों में से एक सूबेदार मेजर राजेन्द्र सिंह
उन्होंने तब देश के दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे जब उन्हें आराम करने के लिए भेजा गया था उन्होंने दुश्मनों को नाके चना चबवा दिया था। वे कहते है की कारगिल में ग्लेशियर की पोस्टिंग से लौटने के बाद शरीर थका था हमे आराम करने के लिए नीचे भेजा गया था ,लेकिन तभी पाकिस्तानियों की घुसपैठियों की खबर मिली तो सारी थकान दूर हो गई और फिर जोश पैदा हो गया । सूबेदार मेजर राजेन्द्र सिंह कारगिल युद्ध के दौरान सिपाही थे और सेना में नई नियुक्ति के बाद उन्हें ग्लेशियर पर भेजा गया था। कुछ महीनों की ट्रेनिंग सेकेंड बेस पर लौटते ही पाकिस्तानी घुसपैठियों के होने की सूचना मिली,जो उनके बेस के नजदीक ही थे ।कारगिल युद्ध को समाप्त हुए दस दिन बीत गए थे लेकिन दुश्मनों की फिर ऐसी हिमाकत को देखकर गुस्सा आया।
जोश से भरे अनुभव को बयां करते हुए राजेन्द्र सिंह कहते है आज भी दुश्मनों से लोहा लेने का मन करता है ।
कारगिल में ग्लेशियर पर थी तैनाती,चट्टानों को चीरते हुवे बढ़े थे आगे।
राजेन्द्र सिंह ने बताया ऑपरेशन विजय 1999 के समय बटालियन नार्दन सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात थी । वहां दूसरी यूनिट के साथ कारगिल की तरफ से नीचे आ रहे थे इसी दौरान सूचना मिली की बेस कैम्प के पास फिर से घुसपैठ हो रही है वह कारगिल के तुरतक(गांव) सेक्टर में मेजर अतुल बिस्ठ के नेतृत्व टीम का हिस्सा बने उन्हें रोप(रस्सी) लगाने की जिम्मेदारी मिली थी सबसे ऊंचे पॉइंट 5810 पर अनुभव का लाभ मिला । चट्टानों के बीच रोप (रस्सी) लगाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई यह तय हुवा की सुरंग छेत्र को दिन के समय हटाया जाए ,जिसकी जिम्मेदारी भी मुझे और मेरे साथी को मिली । इसके बाद 29 अगस्त 1999 को रास्ता साफ करने के लिए मैं जत्थे के साथ आगे बढ़ा । बीस से अधिक रस्सियां ग्लेशियर युक्त चट्टानों में लगाई गई । चट्टानों को चीरते हुए 1.5 किलोमीटर का रास्ता तय करने में सात घंटे का समय लगा और तीस अगस्त को पॉइंट पर पहुचा जिसमे आठ से दस पत्थर की चोट से घायल हो चुके थे लेकिन जोश के साथ पाकिस्तान घुसपैठियों पर हमला किया गया।
एक सिपाही शहीद,20 दुश्मनों का खात्मा।
राजेन्द्र सिंह बताते है कि पॉइंट 5685 पर कब्जा करने के लिंग कंटूर पॉइंट 5880 आवश्यक फायर का बेस बना दिया गया था । इस विजय अभियान में साथी रामदुलारे शहीद हो गए थे और दो जवानों को पाकिस्तान सेना ने पकड़ लिया था,लेकिन फिर भी हमारी टीम ने 15 से 20 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था। जवानों के पास ज्यादा मात्रा में खाद्य सामग्री भी नही थी एमिनेशन खत्म होने की कगार पर था भारी संख्या में जवान घायल हो गए थे फिर भी जवान पूरे जोश के साथ भारत माता की जय की ललकार से दुश्मनों से लोहा लेते रहे।
परिवार में सात लोग भारतीय सेना में दी अपनी सेवाएं
राजेन्द्र सिंह मूलतः हरियाणा के जिला रेवाड़ी गुरियानी गाँव के रहने वाले है जहां गाँव व आस पास के इलाके में अधिकतर भारतीय सेना में है राजेन्द्र सिंह के पिता सूबेदार गणपति सिंह भी 1962 और 65 कि लड़ाई में दुश्मनों के छक्के छुड़ा चुके है उनके चाचा ताऊ व भाई सहित परिवार में सात लोग सेना में शामिल होकर अपने देश भक्ति का परचम लहरा रहे है।
बहादुरी के लिए और भी है किस्से।
6 दिल्ली एनसीसी बटालियन के सूबेदार मेजर राजेन्द्र सिंह के बहादुरी के किस्से और भी है कारगिल युद्ध से पहले तीन अप्रैल 1993 को कुपवाड़ा की जैसलदार पहाड़ी पर तैनाती के दौरान उन्होंने दो आतंकियों को मार गिराया था और हथियारों का जखीरा जब्त किया था।उनकी इस बहादुरी के लिए सेना प्रमुख की ओर से उन्हें प्रसंसा पत्र दिया गया। आज भी वह एनसीसी यूनिट में कोरोना महामारी में सैकड़ो कैडेटों का नेतृत्व कर लोगों की मदद करने का प्रयास किया। जिसके लिए उन्हें एनसीसी निदेशालय से भी प्रसंसा पत्र मिला और वीरता संगठन द्वारा उन्हें वीरता पुरस्कार 2020 से नवाजा गया विभिन्न संस्थानों ने भी उन्हें सम्मान दिया।

