- केंद्र सरकार द्वारा चार नई श्रम संहिताओं को बिना किसी सार्थक चर्चा के लागू करने के प्रयास के विरोध में प्रदेश सहित देश भर में राष्ट्रव्यापी काला दिवस मनाया
भोपाल । केंद्रीय श्रमिक संगठनों एवं स्वतंत्र श्रमिक संगठनों, जिसमें एटक,सीटू, इंटक, एआईयूटीयूसी,सेवा, केन्द्र, राज्य,बैंक, बीमा, दूरभाष, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव आदि संगठन शामिल है,के आह्वान पर केंद्र सरकार की श्रम विरोधी नीतियों एवं नौकरियों - ट्रेड यूनियनों और ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमला करने वाली श्रम संहिताओं के विरोध में आज देश भर में राष्ट्रव्यापी काला दिवस मनाया गया।
इसी तारतम्य में राजधानी भोपाल में आज, 1 अप्रैल 2026 बुधवार को शाम 5:30 बजे डाक भवन चौराहा होशंगाबाद रोड पर सैकड़ों मजदूर ,कामगार, कर्मचारी, अधिकारी, अपने अपने संगठन के झंडा और बैनर्स के साथ इकट्ठे हुए। उन्होंने अपनी मांगों के समर्थन में जोरदार नारेबाजी कर प्रभावी प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के पश्चात सभा हुई जिसे श्रमिक संगठनों के पदाधिकारी साथी वीके शर्मा, एसएस मौर्या , प्रमोद प्रधान, पूषन भट्टाचार्य, विनोद लोगरिया, यशवंत पुरोहित, दीपक रत्न शर्मा, जेपी झवर, शैलेंद्र कुमार शैली, शैलेंद्र शर्मा, भगवान स्वरूप कुशवाहा,आदि ने संबोधित किया।
वक्ताओं ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा चार नई श्रम संहिताओं को बिना किसी सार्थक चर्चा के लागू करने के प्रयास के विरोध में आज प्रदेश सहित देश भर में राष्ट्रव्यापी काला दिवस मनाया जा रहा है। आज मजदूर और कर्मचारियों ने काली पट्टी और काले बैज धारण कर इन चार श्रम संहिताओं का विरोध किया।
उल्लेखनीय है कि 12 फरवरी 2026 को देशव्यापी हड़ताल के माध्यम से श्रमिकों एवं ट्रेड यूनियनों ने इन श्रम संहिताओं का जोरदार विरोध दर्ज कराया था, इसके बावजूद सरकार इनको लागू करने पर आमादा है। ट्रेड यूनियनों का मानना है कि ये श्रम संहिताएं, श्रमिक हितों के विपरीत हैं और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर श्रमिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। इन संहिताओं के माध्यम से यूनियन बनाने की प्रक्रिया को कठिन बनाया जा रहा है, हड़ताल के अधिकार को सीमित किया जा रहा है तथा सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर किया जा रहा है।
वक्ताओं ने आरोप लगाया है कि इन महत्वपूर्ण संहिताओं के निर्माण में ट्रेड यूनियनों से कोई परामर्श नहीं किया गया और भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं एवं अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के विरुद्ध है।
वक्ताओं ने आरोप लगाया है कि इन महत्वपूर्ण संहिताओं के निर्माण में ट्रेड यूनियनों से कोई परामर्श नहीं किया गया और भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं एवं अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के विरुद्ध है।

वक्ताओं ने देश के सभी श्रमिकों, कर्मचारियों एवं समाज के विभिन्न वर्गों से इस आंदोलन को समर्थन देने की अपील की है, ताकि संगठन का अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी एवं श्रमिकों के न्यायपूर्ण अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
अंत में वक्ताओं ने कहा कि केंद्रीय श्रमिक संगठनों से वार्ता किए बिना यदि सरकार इन श्रम संहिताओं को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास करेगी तो आने वाले समय में देशभर में आंदोलन को और तेज कर राष्ट्रव्यापी हड़तालें की जाएंगीं।
