इन लोगों के लिए कई रैन बसेरे भी यहां बनाए गए हैं। लेकिन लोग इतने ज्यादा हैं और रैन बसेरे इतने कम कि बमुश्किल 5% लोगों को ही इनमें रात गुजारना नसीब हो पाता है। और अब तो इन पांच प्रतिशत लोगों से भी यह सुख छिन चुका है क्योंकि बीते शनिवार इन रैन बसेरों को गुस्साई भीड़ ने आग के हवाले कर दिया।
इस बसावट के जो सबसे ‘संपन्न’ लोग हैं उन्होंने अब यहां अपनी झुग्गियां बना कर एक अदद छत का इंतजाम कर लिया है। जो इनसे कुछ कम संपन्न हैं, उनके लिए यहां से गुजरती पानी की मोटी पाइप लाइन छत का काम करती है। और जिन्हें ये भी नसीब नहीं, उनके लिए खुला आसमान ही छत है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यमुना में खड़े मेट्रो पुल के पिलरों को अपना आशियाना बना लिया है।
इस बसावट के जो सबसे ‘संपन्न’ लोग हैं उन्होंने अब यहां अपनी झुग्गियां बना कर एक अदद छत का इंतजाम कर लिया है। जो इनसे कुछ कम संपन्न हैं, उनके लिए यहां से गुजरती पानी की मोटी पाइप लाइन छत का काम करती है। और जिन्हें ये भी नसीब नहीं, उनके लिए खुला आसमान ही छत है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यमुना में खड़े मेट्रो पुल के पिलरों को अपना आशियाना बना लिया है।
जलते हुए शवों की गंध और यमूना के गंदे पानी की सड़ांध के बीच रहते हैं बेघरहवा जब यहां पश्चिम की तरफ बहती है तो बसावट की फिजाओं में निगमबोध घाट पर जलते हुए इंसानी शरीरों की गंध तैरने लगती है। इसके उलट अगर हवा पूर्व को बहती है तो इसमें यमुना के गंधाते पानी और नदी किनारे सड़ते हुए जानवरों के शवों की गंध शामिल होती है। मरे हुए इन जानवरों को नोचते चील-कौओं का शोर और पास में ही स्थित पॉवर स्टेशन के उठती एक सतत भिनभिनाहट इस बसावट को चौबीसों घण्टे गुंजायमान रखते हैं।
जब काम नहीं मिलता तो पेट भरने के लिए ये बेघर लोग शमशान घाट से गेहूं-चावल ले आते हैंइस माहौल में रहने वाले ये हजारों लोग अलग-अलग प्रदेश, धर्म और जातियों के हैं। सिर्फ गरीबी ही ऐसी एक मात्र समानता है जो इन सबको एक सूत्र में बांधती है। इनमें से ज्यादातर लोग कबाड़ इकट्ठा करने का काम करते हैं, कुछ दिहाड़ी-मजदूरी करते हैं और कुछ ब्याह-बारातों को रोशन करने वाली लाइट उठाने या बड़ी-बड़ी पार्टियों में जूठे बर्तन धोने का काम करते हैं। जब इनमें से कोई भी काम नसीब नहीं होता तो ये लोग पेट भरने को निगमबोध घाट से वो गेहूं-चावल उठा लाते हैं जो अंतिम क्रिया में चढ़ाने के बाद लोग वहां छोड़ जाते हैं।
