- ‘स्वामित्व-2026’ पर पटवारियों का सीधा सवाल : जमीन का मालिकाना हक तय करने वाले दस्तावेज में कर्मचारी को निष्पादक क्यों बनाया जा रहा? काम से पीछे नहीं हटेंगे, लेकिन निजी संपत्ति विवाद की कानूनी ढाल बनने को तैयार नहीं
पटवारियों का सवाल सीधा है—जब जमीन का स्वामित्व भूमिस्वामी और शासन के बीच दस्तावेजी प्रक्रिया का विषय है तो बीच में पटवारी को निष्पादक बनाकर उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही क्यों तय की जा रही है?
आज रजिस्ट्री में नाम, कल सिविल कोर्ट में पेशी?
पटवारियों की सबसे बड़ी आशंका भविष्य के मुकदमों को लेकर है। आबादी भूमि के मामलों में केवल नक्शा और खसरा पर्याप्त नहीं होते। वास्तविक कब्जा किसका है, वारिस कौन हैं, सह-स्वामित्व किसका है, चतुस्सीमा सही है या नहीं, पुराने दावे क्या हैं और किसी न्यायालय में विवाद लंबित है या नहीं—ये सभी बातें किसी भी समय विवाद का कारण बन सकती हैं।
ऐसे में पटवारियों का कहना है कि यदि पंजीयन दस्तावेज में उनका नाम निष्पादक के रूप में दर्ज रहेगा तो भविष्य में किसी पक्ष द्वारा स्वामित्व को चुनौती दिए जाने पर पटवारी को भी जवाबदेही के दायरे में लाया जा सकता है।
पटवारियों का सवाल है—क्या सरकार यह लिखित सुरक्षा देगी कि भविष्य में होने वाले किसी स्वामित्व विवाद, कब्जे के विवाद या सिविल मुकदमे में निष्पादक पटवारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं माना जाएगा?
ड्रोन ने नक्शा दिया, पटवारी ने रात-दिन बैठकर अभिलेख बनाए
पटवारियों का कहना है कि स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे के बाद जो नक्शे और आकृतियां उपलब्ध कराई गईं, उनमें कई स्तर पर विसंगतियां सामने आईं। इन तकनीकी खामियों को दूर करने और उनसे संबंधित अधिकार अभिलेख तैयार करने में पटवारियों ने भारी मेहनत की।
अब सवाल यह है कि यदि मूल तकनीकी सर्वे अथवा नक्शे में ही त्रुटि रह गई और उसी आधार पर भविष्य में विवाद हुआ तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?
पटवारी संवर्ग का कहना है कि पहले तैयार अधिकार अभिलेखों का गांव-गांव सत्यापन कराया जाए। सार्वजनिक सूचना, मुनादी और शिविर लगाकर ग्रामीणों को अभिलेख दिखाए जाएं। जिन्हें आपत्ति है, उन्हें सुधार का अवसर मिले। आपत्तियों के निराकरण के बाद ही पंजीयन की प्रक्रिया आगे बढ़े।
‘गलत रजिस्ट्री हुई तो जिम्मेदार पटवारी नहीं’
पटवारियों की मांग है कि पंजीयन प्रारूप में स्पष्ट प्रावधान जोड़ा जाए कि स्वामित्व संबंधी दावे की अंतिम जिम्मेदारी संबंधित लाभार्थी/पक्षकार की होगी और निष्पादन की प्रक्रिया में कार्यरत पटवारी को भविष्य के स्वामित्व विवाद के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं माना जाएगा।
उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी जमीन की रजिस्ट्री करा रहा है तो उसके स्वामित्व दावे की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए। पटवारी को दस्तावेज में निष्पादक बनाकर उसे संभावित मुकदमेबाजी के बीच खड़ा करना कर्मचारी हित में नहीं है।
पटवारी बोले—‘निष्पादक हम नहीं, शासन हो’
पटवारी संवर्ग का प्रस्ताव है कि पंजीयन विलेख में मध्यप्रदेश शासन की भूमिका स्पष्ट की जाए और पटवारी का नाम निष्पादक के रूप में हटाया जाए। जरूरत हो तो ग्राम पंचायत को इस प्रक्रिया में अधिकृत किया जाए, जबकि पटवारी को केवल निर्धारित राजस्व एवं अभिलेखीय दायित्व तक सीमित रखा जाए।
पटवारियों का कहना है कि वे शासन की योजना को सफल बनाने में सहयोग करने के लिए तैयार हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें काम सरकारी हो और भविष्य की व्यक्तिगत कानूनी जवाबदेही कर्मचारी की।
वेतन विसंगति के साथ अब कानूनी जोखिम भी?
पटवारी संवर्ग ने लंबे समय से लंबित वेतन विसंगति के निराकरण की मांग भी दोहराई है। उनका कहना है कि जब वेतन संबंधी मूल समस्या का समाधान नहीं हुआ है, तब अतिरिक्त जिम्मेदारियों के साथ ऐसा कानूनी जोखिम क्यों जोड़ा जा रहा है जिसका असर कर्मचारी के पूरे सेवाकाल और भविष्य पर पड़ सकता है?
चयनित जिलों के पटवारियों ने प्रांतीय संगठन से पूरे मध्यप्रदेश में एक समान निर्णय लेने की मांग की है। उनका कहना है कि अलग-अलग जिलों में अलग-अलग रुख रखने के बजाय प्रदेश स्तर पर शासन के सामने स्पष्ट मांग रखी जाए।
पटवारियों के 5 बड़े सवाल
1. पंजीयन विलेख में पटवारी का नाम निष्पादक के रूप में क्यों?
2. भविष्य में स्वामित्व विवाद होने पर पटवारी की व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी कौन लेगा?
3. ड्रोन सर्वे अथवा अधिकार अभिलेख में त्रुटि निकली तो जवाबदेही किसकी होगी?
4. रजिस्ट्री से पहले ग्रामीणों को आपत्ति एवं सुधार का पर्याप्त अवसर क्यों न दिया जाए?
5. यदि सरकार योजना को सही मानती है तो पटवारी को स्पष्ट कानूनी संरक्षण देने वाला SOP क्यों नहीं जारी किया जा रहा?
मामला अब सिर्फ ‘एक नाम’ का नहीं
पटवारी संवर्ग का कहना है कि यह विवाद केवल पंजीयन विलेख में एक नाम हटाने या जोड़ने का नहीं है। यह सरकारी कर्मचारी की कानूनी सुरक्षा और भविष्य की जवाबदेही का सवाल है।
उनका स्पष्ट रुख है—“शासन का काम है तो शासन ही निष्पादक रहे। पटवारी को अभिलेखीय प्रक्रिया में लगाइए, लेकिन उसे निजी स्वामित्व विवादों का संभावित आरोपी या जवाबदेह मत बनाइए।”
अब गेंद शासन के पाले में है। यदि पंजीयन प्रक्रिया इसी प्रारूप में आगे बढ़ती है तो पटवारी संवर्ग के बीच असंतोष और बढ़ सकता है। वहीं यदि शासन समय रहते पंजीयन प्रारूप में पटवारी की भूमिका स्पष्ट करता है, SOP जारी करता है और कानूनी संरक्षण देता है तो विवाद को टाला जा सकता है।
क्योंकि सवाल बेहद सीधा है—जमीन किसी की, रजिस्ट्री शासन की प्रक्रिया से, लेकिन विवाद होने पर पटवारी
क्यों?
स्वामित्व योजना में पटवारी निष्पादक नहीं बन सकता।
स्वामित्व योजना केंद्र सरकार की योजना है, MP भू-राजस्व संहिता के सामान्य बंटवारे से इसका नियम अलग है।
स्वामित्व योजना में कौन क्या है?
इसमें निष्पादक / अधिकृत अधिकारी:
- तहसीलदार और SDM होते हैं।
- प्रॉपर्टी कार्ड (अधिकार अभिलेख) पर अंतिम हस्ताक्षर तहसीलदार के ही होते हैं।
- ड्रोन सर्वे, नक्शा बनाना - ये काम Survey of India और पंचायत विभाग का है।
इसमें पटवारी की भूमिका क्या है?
पटवारी इसमें निष्पादक नहीं, सहायक / सत्यापनकर्ता है:
1. चूना मार्किंग में मदद: ड्रोन उड़ने से पहले आबादी की जमीन पर चूना डालना
2. मौका सत्यापन: किसका मकान कहाँ है, किसका नाम क्या है, ये जानकारी देना
3. आपत्ति निराकरण: अगर दो पड़ोसियों में मकान की हद को लेकर झगड़ा है, तो मौके पर जाकर रिपोर्ट देना
4. नक्शे से मिलान: पुराने खसरे से नए ड्रोन नक्शे का मिलान करना
क्यों नहीं बन सकता निष्पादक?
क्योंकि स्वामित्व योजना में निष्पादक को न्यायिक शक्तियां चाहिए होती हैं - जैसे आपत्ति खारिज करना, अधिकार अभिलेख में नाम दर्ज करना।
MP शासन के आदेश के अनुसार पटवारी को धारा 129, 250 जैसी न्यायिक शक्तियां नहीं हैं, इसलिए वो निष्पादक नहीं बन सकता। वो सिर्फ प्रतिवेदन दे सकता