Type Here to Get Search Results !

भाषाई पत्रकारिता समाज की आवाज, भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान मिलना जरूरी: जयदीप कर्णिक

  • भारतीय भाषा अनुष्ठान के दूसरे सत्र में भाषाई पत्रकारिता, मातृभाषा और मीडिया की अर्थव्यवस्था पर हुआ विमर्श
भोपाल । ‘भारतीय भाषा अनुष्ठान’ के दूसरे सत्र ‘भाषाई पत्रकारिता, समाज की आवाज’ में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता, मातृभाषा के संरक्षण, डिजिटल मीडिया और भारतीय भाषाओं के सामने मौजूद आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। सत्र में वरिष्ठ पत्रकार श्री जयदीप कर्णिक और श्री गिरीश उपाध्याय ने अपने विचार रखे। सत्र का समन्वयन मुकेश मिश्रा ने किया।


जयदीप कर्णिक ने कहा कि मातृभाषा को केवल एक दिन या दिवस तक सीमित करने के बजाय उसके प्रति निरंतर सजगता और सेवा का भाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब भाषा को मां कहा जाता है तो उसकी सेवा के लिए किसी विशेष दिवस की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने आयोजकों को भारतीय भाषाओं को केंद्र में रखकर इस तरह का आयोजन करने के लिए साधुवाद दिया।

उन्होंने कहा कि भाषाई पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज, संस्कृति और जनमानस की आवाज को सामने लाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत की अलग-अलग भाषाओं में समाचार पत्र और पत्रिकाएं निकलीं और उन्होंने जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी मलयालम, कश्मीरी, बांग्ला, तेलुगु, कन्नड़ सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में समृद्ध पत्रकारिता की परंपरा मौजूद है।

कर्णिक ने कहा कि डिजिटल तकनीक ने भारतीय भाषाओं के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। आज अलग-अलग भाषाओं में सामग्री उपलब्ध है और उसका अनुवाद भी आसानी से किया जा सकता है। इसके बावजूद भारतीय भाषाओं को मुख्यधारा की पत्रकारिता की तुलना में कमतर समझने की मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है।

उन्होंने अंग्रेजी के प्रभाव और उससे पैदा होने वाले भाषाई हीनताबोध पर सवाल उठाते हुए कहा कि अंग्रेजी जानना शिक्षित होने का प्रमाण नहीं है। उन्होंने विज्ञापन और मीडिया के उदाहरणों के माध्यम से कहा कि भारतीय भाषाओं के पाठकों और दर्शकों की संख्या बड़ी होने के बावजूद उनके मुकाबले अंग्रेजी मीडिया का राजस्व कहीं अधिक है। उन्होंने इसे केवल बाजार का विषय नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं, विज्ञापन जगत और निर्णय लेने वाले वर्ग की मानसिकता से जुड़ा प्रश्न बताया।



कर्णिक ने कहा कि किसी भाषा को सीखने या अंग्रेजी जानने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। समस्या उस मानसिकता से है, जिसमें अपनी भाषा को पीछे और अंग्रेजी को श्रेष्ठ मान लिया जाता है। उन्होंने कहा कि दूसरी भाषाएं हमारे लिए खिड़की और रोशनदान की तरह हो सकती हैं, लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति के दरवाजे को हटाकर किसी दूसरी भाषा को उसका स्थान देना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के प्रति वास्तविक सम्मान तभी दिखाई देगा, जब रोजमर्रा के जीवन में भी लोग अपनी भाषाओं को प्राथमिकता दें। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब एटीएम या किसी डिजिटल माध्यम पर भाषा चुनने का विकल्प आए तो लोग हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम या अपनी अन्य भारतीय भाषा का चयन करें।

कर्णिक ने मीडिया के बदलते स्वरूप के संदर्भ में भारतीय भाषाओं की लिपियों के संकट की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी बड़ी मात्रा में भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखने लगी है और अनुवाद के लिए तकनीक पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे में भाषा के साथ-साथ उसकी लिपि और भाषाई स्वरूप के संरक्षण पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।  उन्होंने कहा कि भारत को केवल प्रतीकों या शब्दों में नहीं, बल्कि दिल और दिमाग में स्थापित करने की आवश्यकता है। भाषाओं और संस्कृतियों के बीच वास्तविक समन्वय ही भारत की विविधता को मजबूत कर सकता है।


सत्र में गिरीश उपाध्याय, वरिष्ठ संपादक, भोपाल, ने भी भाषाई पत्रकारिता और समाज के बीच संबंधों पर अपने विचार रखे। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में अपने दीर्घ अनुभव के संदर्भ में भाषाई पत्रकारिता की भूमिका और बदलते मीडिया परिदृश्य पर चर्चा की।


इस अवसर पर सत्र के समन्वयक मुकेश मिश्रा ने भाषाई पत्रकारिता को समाज की आवाज बताते हुए कहा कि भारत जैसे बहुभाषी देश में जनमानस की व्यापक अभिव्यक्ति के लिए सभी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का महत्व समान रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को केवल ‘क्षेत्रीय’ पत्रकारिता मानकर सीमित नहीं किया जा सकता। यह देश के करोड़ों लोगों की आवाज, विचार और सामाजिक सरोकारों को सामने लाने वाली मुख्यधारा की पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।