भारतीय विचारधारा पर आधारित एक श्रमिक संगठन के निर्माण के लक्ष्य के साथ 23 जुलाई 1955 को, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती पर, श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा शुरू किया गया संगठन 'भारतीय मज़दूर संघ' (BMS) है। आगामी 23 जुलाई को बी.एम.एस. अपने 72वें वर्ष में कदम रख रहा है। केवल एक वर्ग-संघर्ष संगठन होने से परे, यह वह संगठन है जिसने भारतीय श्रम क्षेत्र को 'राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत श्रमिक' का क्रांतिकारी विचार उपहार में दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अपने शताब्दी (100 वर्ष) वर्ष मनाने के इस ऐतिहासिक कालखंड में, बी.एम.एस. की प्रासंगिकता, वैचारिक प्रगति और साथ ही नए लेबर कोड (श्रम संहिताओं) द्वारा उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है।
आर.एस.एस. शताब्दी और बी.एम.एस. की वैचारिक प्रगति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर, जब हम यह विश्लेषण करते हैं कि संघ के विचारों ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों को कैसे प्रभावित किया, तो भारतीय मज़दूर संघ इसका सबसे उज्ज्वल अध्याय बनकर उभरता है। जिस समय पश्चिमी आयातित कम्युनिस्ट-पूंजीवादी सिद्धांत भारतीय श्रम क्षेत्र पर हावी थे, उस समय बी.एम.एस. ने एक वैकल्पिक वैचारिक दृष्टिकोण सामने रखा।
वर्ग-संघर्ष नहीं, वर्ग-समन्वय:* जहाँ कम्युनिस्ट 'वर्ग-संघर्ष' (Class Struggle) में विश्वास करते हैं, वहीं बी.एम.एस. ने 'वर्ग-समन्वय' (Class Harmony) का भारतीय दर्शन सामने रखा। बी.एम.एस. ने सिखाया कि नियोक्ता (मालिक) और श्रमिक दुश्मन नहीं हैं, बल्कि एक ही परिवार के सदस्यों की तरह मिलकर काम करने वाले सहयोगी हैं।
श्रम का राष्ट्रीयकरण: "उद्योगों का श्रमिकीकरण, राष्ट्र का औद्योगिकीकरण और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण" (Laborise the Industry, Industrialise the Nation, Nationalise the Labour) संगठन का मूल मंत्र था।
बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में, जहाँ कम्युनिस्ट यूनियनों की प्रासंगिकता समाप्त हो रही है, वहीं बी.एम.एस. अपनी इसी मजबूत वैचारिक नींव के कारण और अधिक मजबूती से आगे बढ़ रहा है।
समकालीन समाज में बी.एम.एस. की प्रासंगिकता
आज बी.एम.एस. भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय ट्रेड यूनियन है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी भी राजनीतिक दल का आनुषंगिक संगठन बने बिना, स्वतंत्र रूप से कार्य करता है।
गैर-राजनीतिक ट्रेड यूनियनिज़्म: बी.एम.एस. राजनीतिक दलों के हितों के लिए श्रमिकों को सड़कों पर उतारने की प्रवृत्ति के खिलाफ है। चाहे सत्ता में कोई भी दल आए, श्रमिकों के अधिकारों के लिए बिना किसी समझौते के कड़ा रुख अपनाने की क्षमता बी.एम.एस. को इसी गैर-राजनीतिक चरित्र से मिलती है।
असंगठित क्षेत्र में हस्तक्षेप: पारंपरिक कारखाना श्रमिकों और अन्य संगठित क्षेत्रों तक ही सीमित न रहकर, बी.एम.एस. ने आज भारत के बहुसंख्यक असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) के श्रमिकों — जैसे आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कर्मचारी, निर्माण श्रमिक और गिग वर्कर्स (Gig Workers) तक अपने कार्य का विस्तार किया है। कॉर्पोरेटिकरण के इस दौर में श्रमिकों के संबल के रूप में खड़े रहने की क्षमता आज केवल बी.एम.एस. में ही है।
नया लेबर कोड और बी.एम.एस. का रुख
केंद्र सरकार द्वारा मौजूदा 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को संहिताबद्ध करके 4 लेबर कोड्स (Labour Codes) में बदलने की पृष्ठभूमि में, बी.एम.एस. की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह कानूनी सुधार श्रम क्षेत्र में बड़े बदलाव और साथ ही कुछ चिंताएँ भी पैदा कर रहा है।
लेबर कोड्स में उद्योग-अनुकूल बदलावों का समर्थन करते हुए भी, श्रमिकों के अधिकारों का हनन करने वाली धाराओं के खिलाफ केंद्र सरकार से सीधे सुधार की मांग करने में बी.एम.एस. कभी पीछे नहीं हटा है। इन कोड्स को राज्य स्तर पर लागू करते समय, श्रमिक-विरोधी प्रावधानों को संशोधित कराने के लिए बी.एम.एस. लगातार दबाव बना रहा है।
72वें वर्ष में चुनौतियाँ और आगे की राह
72वें वर्ष में प्रवेश कर रहे बी.एम.एस. के सामने नए युग की चुनौतियाँ हैं। यह वह समय है जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन रोजगार के अवसरों को कम कर रहे हैं।
नई कार्य संस्कृति: पारंपरिक हड़ताल (Strike) के तरीकों से हटकर, बी.एम.एस. चर्चाओं और कानूनी संघर्षों के माध्यम से समाधान खोजने की एक नई कार्य संस्कृति विकसित कर रहा है। "देश का हित सबसे पहले, उद्योग का हित दूसरे स्थान पर और श्रमिक का हित तीसरे स्थान पर" का व्यापक दृष्टिकोण बी.एम.एस. का मार्गदर्शन करता है। इसके पीछे यह व्यावहारिक समझ है कि यदि उद्योग नष्ट होगा, तो श्रमिक भी नष्ट हो जाएगा।
आर.एस.एस. का शताब्दी वर्ष और बी.एम.एस. का 72वां स्थापना दिवस जब एक साथ आ रहे हैं, तो भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने में श्रमिकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। पूंजीवाद के शोषण और कम्युनिज़्म की हिंसक राजनीति का शिकार हुए बिना भारतीय श्रमिक वर्ग का नेतृत्व करने में बी.एम.एस. सफल रहा है। कामना है कि नए लेबर कोड की चुनौतियों पर विजय प्राप्त करते हुए, देश के प्रत्येक आम आदमी के पसीने की सही कीमत दिलाने के लिए भारतीय मज़दूर संघ की वैचारिक शक्ति आने वाले वर्षों में भी इसी तरह समर्थ बनी रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर, जब हम यह विश्लेषण करते हैं कि संघ के विचारों ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों को कैसे प्रभावित किया, तो भारतीय मज़दूर संघ इसका सबसे उज्ज्वल अध्याय बनकर उभरता है। जिस समय पश्चिमी आयातित कम्युनिस्ट-पूंजीवादी सिद्धांत भारतीय श्रम क्षेत्र पर हावी थे, उस समय बी.एम.एस. ने एक वैकल्पिक वैचारिक दृष्टिकोण सामने रखा।
वर्ग-संघर्ष नहीं, वर्ग-समन्वय:* जहाँ कम्युनिस्ट 'वर्ग-संघर्ष' (Class Struggle) में विश्वास करते हैं, वहीं बी.एम.एस. ने 'वर्ग-समन्वय' (Class Harmony) का भारतीय दर्शन सामने रखा। बी.एम.एस. ने सिखाया कि नियोक्ता (मालिक) और श्रमिक दुश्मन नहीं हैं, बल्कि एक ही परिवार के सदस्यों की तरह मिलकर काम करने वाले सहयोगी हैं।
श्रम का राष्ट्रीयकरण: "उद्योगों का श्रमिकीकरण, राष्ट्र का औद्योगिकीकरण और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण" (Laborise the Industry, Industrialise the Nation, Nationalise the Labour) संगठन का मूल मंत्र था।
बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में, जहाँ कम्युनिस्ट यूनियनों की प्रासंगिकता समाप्त हो रही है, वहीं बी.एम.एस. अपनी इसी मजबूत वैचारिक नींव के कारण और अधिक मजबूती से आगे बढ़ रहा है।
समकालीन समाज में बी.एम.एस. की प्रासंगिकता
आज बी.एम.एस. भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय ट्रेड यूनियन है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी भी राजनीतिक दल का आनुषंगिक संगठन बने बिना, स्वतंत्र रूप से कार्य करता है।
गैर-राजनीतिक ट्रेड यूनियनिज़्म: बी.एम.एस. राजनीतिक दलों के हितों के लिए श्रमिकों को सड़कों पर उतारने की प्रवृत्ति के खिलाफ है। चाहे सत्ता में कोई भी दल आए, श्रमिकों के अधिकारों के लिए बिना किसी समझौते के कड़ा रुख अपनाने की क्षमता बी.एम.एस. को इसी गैर-राजनीतिक चरित्र से मिलती है।
असंगठित क्षेत्र में हस्तक्षेप: पारंपरिक कारखाना श्रमिकों और अन्य संगठित क्षेत्रों तक ही सीमित न रहकर, बी.एम.एस. ने आज भारत के बहुसंख्यक असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) के श्रमिकों — जैसे आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कर्मचारी, निर्माण श्रमिक और गिग वर्कर्स (Gig Workers) तक अपने कार्य का विस्तार किया है। कॉर्पोरेटिकरण के इस दौर में श्रमिकों के संबल के रूप में खड़े रहने की क्षमता आज केवल बी.एम.एस. में ही है।
नया लेबर कोड और बी.एम.एस. का रुख
केंद्र सरकार द्वारा मौजूदा 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को संहिताबद्ध करके 4 लेबर कोड्स (Labour Codes) में बदलने की पृष्ठभूमि में, बी.एम.एस. की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह कानूनी सुधार श्रम क्षेत्र में बड़े बदलाव और साथ ही कुछ चिंताएँ भी पैदा कर रहा है।
लेबर कोड्स में उद्योग-अनुकूल बदलावों का समर्थन करते हुए भी, श्रमिकों के अधिकारों का हनन करने वाली धाराओं के खिलाफ केंद्र सरकार से सीधे सुधार की मांग करने में बी.एम.एस. कभी पीछे नहीं हटा है। इन कोड्स को राज्य स्तर पर लागू करते समय, श्रमिक-विरोधी प्रावधानों को संशोधित कराने के लिए बी.एम.एस. लगातार दबाव बना रहा है।
72वें वर्ष में चुनौतियाँ और आगे की राह
72वें वर्ष में प्रवेश कर रहे बी.एम.एस. के सामने नए युग की चुनौतियाँ हैं। यह वह समय है जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन रोजगार के अवसरों को कम कर रहे हैं।
नई कार्य संस्कृति: पारंपरिक हड़ताल (Strike) के तरीकों से हटकर, बी.एम.एस. चर्चाओं और कानूनी संघर्षों के माध्यम से समाधान खोजने की एक नई कार्य संस्कृति विकसित कर रहा है। "देश का हित सबसे पहले, उद्योग का हित दूसरे स्थान पर और श्रमिक का हित तीसरे स्थान पर" का व्यापक दृष्टिकोण बी.एम.एस. का मार्गदर्शन करता है। इसके पीछे यह व्यावहारिक समझ है कि यदि उद्योग नष्ट होगा, तो श्रमिक भी नष्ट हो जाएगा।
आर.एस.एस. का शताब्दी वर्ष और बी.एम.एस. का 72वां स्थापना दिवस जब एक साथ आ रहे हैं, तो भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने में श्रमिकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। पूंजीवाद के शोषण और कम्युनिज़्म की हिंसक राजनीति का शिकार हुए बिना भारतीय श्रमिक वर्ग का नेतृत्व करने में बी.एम.एस. सफल रहा है। कामना है कि नए लेबर कोड की चुनौतियों पर विजय प्राप्त करते हुए, देश के प्रत्येक आम आदमी के पसीने की सही कीमत दिलाने के लिए भारतीय मज़दूर संघ की वैचारिक शक्ति आने वाले वर्षों में भी इसी तरह समर्थ बनी रहे।
(लेखक राजन नायर, भारतीय मजदूर संघ, मध्यप्रदेश के प्रदेश मंत्री हैं।)

