- जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकारों अथवा वैज्ञानिकों के प्रयासों से नहीं जीती जा सकती, बल्कि किसानों, उद्योगों, शैक्षणिक संस्थानों, सिविल सोसाइटी और युवाओं की सक्रिय सहभागिता से ही जलवायु-अनुकूल एवं सशक्त समुदायों का निर्माण हो सकेगा
भोपाल । भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल में 8 जून 2026 को ‘इंस्पायर्ड बाय नेचर । फॉर क्लाइमेट । फॉर फ्यूचर ।’ विषय के साथ विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया । इस अवसर पर अतिथियों द्वारा वृक्षारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में मृदा पर्यावरण विज्ञान प्रभाग के प्रभागाध्यक्ष डॉ. तपन अधिकारी ने अतिथियों का स्वागत किया तथा विश्व पर्यावरण दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के समाधान हेतु त्वरित एवं सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. मनोरंजन मोहंती ने अपने संबोधन में ‘वन हेल्थ’ की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि मृदा, पौधों, पशुओं, मानव और पर्यावरण का स्वास्थ्य परस्पर जुड़ा हुआ है । उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकारों अथवा वैज्ञानिकों के प्रयासों से नहीं जीती जा सकती, बल्कि किसानों, उद्योगों, शैक्षणिक संस्थानों, सिविल सोसाइटी और युवाओं की सक्रिय सहभागिता से ही जलवायु-अनुकूल एवं सशक्त समुदायों का निर्माण संभव है । उन्होंने आगे कहा कि लगाया गया प्रत्येक पौधा, संरक्षित की गई प्रत्येक जल बूंद, पुनर्स्थापित की गई प्रत्येक हेक्टेयर भूमि तथा अपनाई गई प्रत्येक कृषि पद्धति एक हरित एवं सुरक्षित भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती है । उन्होंने सभी से प्रकृति से प्रेरणा लेने, जलवायु कार्रवाई को सशक्त बनाने तथा उत्पादक, लचीले, समतामूलक (सस्टेनेबल) एवं सतत भविष्य के निर्माण हेतु संकल्पित होने का आह्वान किया ।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेश मोटवानी (महाप्रबंधक, सॉलिडैरिडाड) ने पुनर्योजी कृषि (रिजनरेटिव एग्रीकल्चर) एवं सतत कृषि प्रणालियों की भूमिका पर अपने अनुभव साझा किए । उन्होंने बताया कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में इन प्रणालियों की महत्वपूर्ण भूमिका है । साथ ही उन्होंने कहा कि खाद्य प्रणाली आधारित कृषि उपभोक्ताओं में पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता की आवश्यकता है ।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेश मोटवानी (महाप्रबंधक, सॉलिडैरिडाड) ने पुनर्योजी कृषि (रिजनरेटिव एग्रीकल्चर) एवं सतत कृषि प्रणालियों की भूमिका पर अपने अनुभव साझा किए । उन्होंने बताया कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में इन प्रणालियों की महत्वपूर्ण भूमिका है । साथ ही उन्होंने कहा कि खाद्य प्रणाली आधारित कृषि उपभोक्ताओं में पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता की आवश्यकता है ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. आर. एन. साहू (प्रधान वैज्ञानिक, आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली) द्वारा डॉ. एन. एस. रंधावा फाउंडेशन डे व्याख्यान प्रस्तुत किया गया । उन्होंने “इंटेलिजेंट सेंसिंग के माध्यम से पिक्सल का सामाजिकीकरण” विषय पर व्याख्यान देते हुए भारत में कृषि अनुसंधान के नवाचार-आधारित परिवर्तन को ‘हरित क्रांति से जीन क्रांति’ तक की यात्रा के उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया । उन्होंने पिक्सल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआय), जनरेटिव एआई (जनएआय), मशीन लर्निंग (एम् यल), डीप लर्निंग (डीयल), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आय ओ टी), सेंसर, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन तकनीक, आनुवंशिक मानचित्रण, वैरिएबल रेट टेक्नोलॉजी, एज कम्प्यूटिंग तथा सुपर स्पेक्ट्रल रेजोल्यूशन जैसी उन्नत डिजिटल तकनीकों की कृषि एवं पर्यावरण संरक्षण में भूमिका और लाभों पर विस्तार से जानकारी दी । उन्होंने बताया कि एआई एवं आईओटी आधारित स्वचालित प्रणालियाँ पोषक तत्व प्रबंधन, जल प्रबंधन, फसल प्रबंधन तथा मत्स्य पालन सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी समाधान प्रदान कर रही हैं । डॉ. साहू ने कृषि क्षेत्र में उत्पादकता एवं उत्पादन को अधिकतम करने के लिए वैज्ञानिकों से सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) मॉडल को बढ़ावा देने का आह्वान किया ।
कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. निशा साहू एवं डॉ. सोनल तथा सॉलिडैरिडाड के अधिकारियों द्वारा किया गया । इस कार्यक्रम में लगभग 150 प्रतिभागियों जिनमें वैज्ञानिक, कर्मचारी, विद्यार्थी एवं शोधार्थियों शामिल थे, ने सक्रिय एवं उत्साहपूर्ण सहभागिता की ।


