अनिल कर्मा
एलोपैथी कारगर है या आयुर्वेद? मोदी महान है या बहुरूपिया? आंसू असली है या दिखावा? तीसरी लहर आएगी या नहीं? अफसर बदमिजाज हो रहे हैं या शिक्षा और सिस्टम का दोष है? सोशल साइट्स पर नई गाइडलाइन सही है या सरकार की आलोचना रोकने का तरीका?... हवा में तैर रहे इन और इन जैसे अनंत बहस के अनेकों सवालों से अगर आप बाहर आ पाएं तो एक बार सोचिएगा कुछ और चीजें भी हैं, देखने, समझने और विचारने के लिए। आपने अगर ध्यान दिया हो तो तापमापी तोड़ते तापमान की खबरें इस बार अखबारों में सुर्खियां नहीं बनी
(शायद इसलिए क्योंकि और बहुत कुछ टूटने की खबरें अखबारों के पहले पन्ने की सारी बनावट को तोड़ रही थी। सांसें टूट रही थी, अरमान टूट रहे थे, रिश्ते टूट रहे थे, भावनाएं टूट रही थी, भरोसे टूट रहे थे, लोग टूट रहे थे... यहां तक कि भगवान टूट रहे थे।) पानी की किल्लत की इस बार कोई खबर नहीं दिखी। पतझड़ पता ही नहीं चला ( पेड़ से जुदा हुए सूखे पत्ते कदाचित इतनी सकुचाहट के साथ सरसराये होंगे मानो ऑक्सीजन के टोटे का तमाम अपराधबोध अपने सिर उठाए हों।) लू चली क्या? इस बार सूखे का कोई सर्वे हुआ है क्या? कोई हल्ला तो नहीं है। महसूस कीजिए, गर्मी इस बार गर्मी जैसी नहीं रही। तो फिर? हां, गमी जैसी रही। मौन । मरघट। देशव्यापी गमी।गमी के घर में धूप-धूल-पसीना कहां समझ में आता है। वहां तो यह सब एक अजीब से खालीपन में समा जाते हैं। एक चिता पर कई अस्तित्व एक साथ राख होते हैं। फिर बीते दिनों तो चिताएं हर मोहल्लेे, नुक्कड़ पर होने वाले होलिका दहन जैसी देखी हैं हम सबने। कितना कुछ स्वाहा हुआ होगा। अंदर। बाहर।
पर हां, अब मौसम कुछ बदलने लगा है। हालांकि फिलहाल इसके मूल में 'ताऊ ते' और 'यास' नामक तूफान हैं, पर सारे तूफान अब बौने लगते हैं। सदी के सबसे प्रचंड तूफान से गुजरते हुए शायद हम आपदा की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। नए मानदंड। इसलिए तूफान सेे आ रही बूंदें भी अगर चिताओं की राख को कुछ ठंडा कर पा रही हैं तो थोड़ी राहत ही महसूस हो रही है। श्मशानों की सांस फूलना कुछ कम हुई है। संक्रमण घट रहा है शायद। अस्पतालों के ऑक्सीमीटर बताने लगे हैं कि ऑक्सीजन पर्याप्त है। और नब्ज भी दुरुस्त है (बेड उपलब्ध हैं, कुछ इलाज भी।) आंकड़े सिकुड़ने लगे हैं। आगे केेे अंदाजे अब कुछ कम डरा रहे हैं।
और ऐसे में मानसून हमारी तरफ बढ़ रहा है। बस आया ही समझो। क्या यह मानसूनी फुहार, रिमझिम या झमाझम पिछले सालों की तरह ही रहेगी। क्या इस बार भी हम अंदर तक भीग पाएंगे? क्या गमी की गर्मी को इतनी जल्दी भुलाकर हम उमंग के सावन का स्वागत करने के लिए खुद को तैयार कर पाएंगे? या सब कुछ बदला-बदला रहेगा? बूंदें घुंघरूओं की जगह आंसुओं की लड़ी तो नहीं गूंथ लाएंगी? बारिश बेरंग तो नहीं हो जाएगी? वह बेवा का भेष धरकर तो नहीं आएगी? सोचिए ना, किसी के लिए 'बबलू' की शरारत के बिना क्या बारिश ! तो किसी के लिए बाबूजी की मुस्कान के बिना क्या बदलियांं ! किसी ने मां खोई , किसी ने बहन। किसी ने यार। किसी ने प्यार। किसी बिरहन का बांका ही सदा के लिए विदा हो गया तो क्या मन तरसे और क्या पानी बरसे...! सारी रूमानियत जैसे रुख़सत होती लगती है। भावनाएं भस्म होती लगती हैं...।
मगर जीवन फिर जीवन है। उठने का नाम। चलने का नाम। जो थम गए तो कुछ नहीं। मगर सवाल कई। उठें कैसे? चलें कैसे? भूलें कैसे? भुलाएं कैसे? भीगे कैसे? भिगोए कैसे? हल एक ही। बूंदों को आंसुओं सेे बदलना और आंसुओं को बूंदों से। विनाश की इस महालीला में हम सबने अपना कुछ ना कुछ खोया है। पर हां, कुछ न कुछ बचा भी लिया है। और कुछ नहींं तो उम्मीद का एक कतरा तो बचा ही है कि थोड़ा ठहरो, सब ठीक होगा। तो आइए, जो खोया है उसे बूंदों के हवाले करें। यादों के कागज की कश्ती को बारिश के पानी में तैरने के लिए छोड़ें। दूर तक उसे जाते हुए देखें। नानी की कहानी की तरह...। और जो बचा है, उसे सहेजें। उसे बांंटे। सोचिए ना, अगर किसी के माथे पर स्नेह का हाथ फेरने से, उसके बालों में उंगलियां घुमाने से उसे उसके खोए हुए पिता का स्पर्श महसूस होता है तो आप भी अपने बिछड़े बेटे के हाथों की गर्मी उसके हाथों में पा सकते है। 'भैया' कहने भर से अगर किसी की बहन की कमी पूरी होती है, तो उसे कहिए ना कि वह आपको ''छुटकी'' बुलाए, जैसा आपका भैया बुलाया करता था। आसपास देखिए तो, ऐसे ही मां मिल सकती है। ऐसे ही बिटिया दिख सकती है। ऐसे ही कोई प्यारा दोस्त गले लग सकता है, बदली हुई सूरत में। और हां, उस बिरहन को भी हम सब मिलकर एक मासूम मुस्कान तो दे ही सकते हैं। बस ध्येय एक ही हो- किसी का सावन सूना ना रहे। भादो किसी को भार ना लगे।
बेशक शुरू में गिनाए गए तमाम मौजू मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन पर चर्चा जरूरी है। कीजिए। मगर जीवन के मौसम पर मंथन को उससे भी पहले रखिए। विकट समय में रिश्तों की गर्मी-बारिश को साध लिया, तो आगे बहार ही बहार होगी। आप क्या सोचते हैं?