केंचुआ के द्वारा 5 राज्यों की विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित होते ही भारत में खाडी की जंग और रसोई गैस सिलेंडर की अफरातफरी की खबरें अपने आप दब जाएंगी, क्योंकि इन पांच राज्यों की सत्ता हासिल करने के लिए सरकारी पार्टी भाजपा इस बार ऐढी-चोटी का जोर लगा रही है.
जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होना है उनमें से असम और पुडुचेरी में भाजपा पहले से सत्तारूढ है.भाजपा का असली और पुराना सपना तो बंगाल, केरल और तमिलनाडु में रामराज स्थापित करने के लिए सत्ता हासिल करने का है.भाजपा पिछले 46 साल से दक्षिण -पूर्व के इन तीन राज्यों में धर्मध्वजाएं लेकर घूम रही है, लेकिन उसे कामयाबी हासिल नहीं हुई.
अखंड ब्रम्हांड के नेता बनने के बावजूद बंगाल, केरल और तमिलनाडु की जनता ने प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर अभी तक तो भरोसा नहीं किया. इस बार कर ले तो मैं कह नहीं सकता, क्योंकि अब भाजपा चुनाव जीतने के लिए अपने चुनाव घोषणापत्र से ज्यादा मुख्य चुनाव आयोग पर निर्भर है.
आपको याद होगा कि बांग्लादेशशियों को भारत से खदेडने के नाम पर भाजपा सरकार ने पहली बार मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) अभियान शुरू किया. बिहार में सरकार को इसका लाभ भी मिला. अब केरल, तमिलनाडु और बंगाल में इस एस आई आर का कमाल देखना बाकी है.कहते हैं कि ये सबसे तेज चुनाव हैं क्योंकि इन चुनावों की प्रक्रिया 21 दिन में पूरी हो रही है.
पांच राज्यों के ये विधानसभा चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये चुनाव उस केंचुआ की देखरेख में हो रहे हैं जिसके खिलाफ देश की आधी संसद अविश्वास प्रकट कर चुकी है. नैतिकता तो कहती है कि केंचुआ ज्ञानेश को भी लोकसभा अध्यक्ष की तरह अपने खिलाफ अविश प्रस्ताव पर संसद में बहस होने तक चुनाव प्रक्रिया से अलग हो जाना चाहिए था, किंतु नैतिकता है कहाँ? अब ये चुनाव उन्ही ज्ञानेश बाबू के नेतृत्व में होंगे जो सरकार की कठपुतली कहे जा चुके हैं.
केंचुआ ने पांच में से चार राज्यों के चुनाव एक ही दिन कराने का निर्णय किया किंतु बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे. तर्क दिया जा सकता है कि बंगाल मेंं मतदाताओं की संख्या बाकी के चार राज्यों से कहीं ज्यादा है.हकीकत ये है कि बंगाल ही भाजपा के लिए सबसे बडी चुनौती है. बंगाल को एक दिन के मतदान से नही जीता जा सकता. केंचुआ पहले ही बंगाल के 45 लाख मतदाताओं को अलग करने की व्यवस्था कर चुका है.
आपको याद होगा कि भाजपा ने असम में एस आई आर नहीं कराई जबकि असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा शरमा असम में सबसे ज्यादा बांग्लादेशी होने का दावा करते हैं. वे इन बांग्लादेशी मुसलमानों को मियाँ मुसलमान कहकर इन्हें सताने की बात भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं किंतु वे इन बांग्लादेशियो को मतदाता सूची से बाहर नहीं करना चाहते क्योंकि बडी संख्या में यही मतदाता उनके साथ भी हैं. शरमा जी गुड खाते हैं लेकिन गुलगुलों से नेम(परहेज) करते हैं.
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें जीत -हार से केंद्र की सत्ता पर कोई असर नहीं पडने वाला क्योंकि इन पांच राज्यों में से कोई भी राज्य भाजपा की बैशाखी नहीं है. भाजपा की एक बैशाखी मेड इन बिहार है तो दूसरी मेड इन आंध्रा है. यहाँ तो भाजपा को जो भी हासिल होगा वो बोनस माना जाएगा. फिर भी मुझे लगता है कि बंगाल, केरल और तमिलनाडु जीतने के लिए भाजपा को अभी 46 साल इंतजार और करना पड सकता है. मोदी के रहते इन तीन राज्यों को जीतना कठिन है.चलिए अब तेल देखते हैं और तेल की धार भी देखते हैं.
@ राकेश अचल
अखंड ब्रम्हांड के नेता बनने के बावजूद बंगाल, केरल और तमिलनाडु की जनता ने प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर अभी तक तो भरोसा नहीं किया. इस बार कर ले तो मैं कह नहीं सकता, क्योंकि अब भाजपा चुनाव जीतने के लिए अपने चुनाव घोषणापत्र से ज्यादा मुख्य चुनाव आयोग पर निर्भर है.
आपको याद होगा कि बांग्लादेशशियों को भारत से खदेडने के नाम पर भाजपा सरकार ने पहली बार मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) अभियान शुरू किया. बिहार में सरकार को इसका लाभ भी मिला. अब केरल, तमिलनाडु और बंगाल में इस एस आई आर का कमाल देखना बाकी है.कहते हैं कि ये सबसे तेज चुनाव हैं क्योंकि इन चुनावों की प्रक्रिया 21 दिन में पूरी हो रही है.
पांच राज्यों के ये विधानसभा चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये चुनाव उस केंचुआ की देखरेख में हो रहे हैं जिसके खिलाफ देश की आधी संसद अविश्वास प्रकट कर चुकी है. नैतिकता तो कहती है कि केंचुआ ज्ञानेश को भी लोकसभा अध्यक्ष की तरह अपने खिलाफ अविश प्रस्ताव पर संसद में बहस होने तक चुनाव प्रक्रिया से अलग हो जाना चाहिए था, किंतु नैतिकता है कहाँ? अब ये चुनाव उन्ही ज्ञानेश बाबू के नेतृत्व में होंगे जो सरकार की कठपुतली कहे जा चुके हैं.
केंचुआ ने पांच में से चार राज्यों के चुनाव एक ही दिन कराने का निर्णय किया किंतु बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे. तर्क दिया जा सकता है कि बंगाल मेंं मतदाताओं की संख्या बाकी के चार राज्यों से कहीं ज्यादा है.हकीकत ये है कि बंगाल ही भाजपा के लिए सबसे बडी चुनौती है. बंगाल को एक दिन के मतदान से नही जीता जा सकता. केंचुआ पहले ही बंगाल के 45 लाख मतदाताओं को अलग करने की व्यवस्था कर चुका है.
आपको याद होगा कि भाजपा ने असम में एस आई आर नहीं कराई जबकि असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा शरमा असम में सबसे ज्यादा बांग्लादेशी होने का दावा करते हैं. वे इन बांग्लादेशी मुसलमानों को मियाँ मुसलमान कहकर इन्हें सताने की बात भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं किंतु वे इन बांग्लादेशियो को मतदाता सूची से बाहर नहीं करना चाहते क्योंकि बडी संख्या में यही मतदाता उनके साथ भी हैं. शरमा जी गुड खाते हैं लेकिन गुलगुलों से नेम(परहेज) करते हैं.
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें जीत -हार से केंद्र की सत्ता पर कोई असर नहीं पडने वाला क्योंकि इन पांच राज्यों में से कोई भी राज्य भाजपा की बैशाखी नहीं है. भाजपा की एक बैशाखी मेड इन बिहार है तो दूसरी मेड इन आंध्रा है. यहाँ तो भाजपा को जो भी हासिल होगा वो बोनस माना जाएगा. फिर भी मुझे लगता है कि बंगाल, केरल और तमिलनाडु जीतने के लिए भाजपा को अभी 46 साल इंतजार और करना पड सकता है. मोदी के रहते इन तीन राज्यों को जीतना कठिन है.चलिए अब तेल देखते हैं और तेल की धार भी देखते हैं.
@ राकेश अचल
