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अद्वैत वेदांत के मर्मज्ञ उमाशंकर पचौरी ने कहा: भारतीय सांस्कृतिक एकता का परिचय जगदगुरू आदि श्री शंकराचार्य जी हैं

भोपाल ।   मातृभाषा मंच के द्वारा आदि शंकराचार्य पर केंद्रित प्रबोधन कार्यक्रम श्री नारायण गुरु मंदिर, सुभाष नगर में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मातृभाषा मंच के अध्यक्ष संतोष कुमार राउत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक  सोमकांत उमालकर विशेष रूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अद्वैत वेदांत के मर्मज्ञ उमाशंकर पचौरी थे।
 कार्यक्रम के प्रारंभ में मातृभाषा मंच के संयोजक अमिताभ सक्सेना ने मातृभाषा मंच का परिचय देते हुए कहा कि विगत 8 वर्षों से मातृभाषा मंच भोपाल नगर के विभिन्न भाषायी परिवारों में मातृभाषा की स्वीकार्यता को बढ़ाने में प्रयासरत हैं। इस हेतु भारतीय भाषायी संस्कृति पर अनेकों आयोजन समय-समय पर संस्था करती रही है। 
श्री सक्सेना ने कार्यक्रम का उद्देश्य बताते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य जी की जयंती हमें एक अवसर देती है कि हम उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का स्मरण करें।



मुख्य वक्ता के रूप में उमाशंकर पचौरी ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में आदि शंकराचार्य को स्मरण करते हुए कहा कि; आदि शंकराचार्य ने 'अहं ब्रह्मास्मि' का सूत्र दिया। 'अहं ब्रह्मास्मि' का अर्थ है "मैं ब्रह्म हूँ। यह बृहदारण्यक उपनिषद (यजुर्वेद) का एक महावाक्य है जो अद्वैत वेदांत के अनुसार व्यक्ति की आत्मा और परमेश्वर (ब्रह्म) के एक होने का बोध कराता है। इसका अर्थ यह है कि हम शरीर नहीं, बल्कि शाश्वत, अमर और दिव्य आत्मा हैं।

'अहं' का अर्थ 'मैं' और 'ब्रह्मास्मि' का अर्थ 'ब्रह्म हूँ' है। यह अहंकार नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान का सर्वोच्च स्तर है। यह अद्वैत (Non-duality) का प्रतीक है- जीव (आत्मा) और ईश्वर (ब्रह्म) अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। यह अज्ञान को मिटाकर आत्मज्ञान का संकेत देता है। यह वाक्यांश सिखाता है कि हम सभी के भीतर दिव्य शक्ति निवास करती है और सही ज्ञान से हम अपने सच्चे स्वरूप को पहचान सकते हैं।

अपने उद्बोधन में श्री पचौरी ने आदि शंकराचार्य के कृतित्व की व्याख्या करते हुये कहा कि; आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) का भारतीय संस्कृति, दर्शन और सनातन धर्म के पुनरुत्थान में अतुलनीय योगदान है। उन्होंने अद्वैत वेदांत (ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या) का प्रतिपादन किया, भारत के चारों कोनों में 4 मठ स्थापित किए, उन्होंने उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्‌गीता (प्रस्थानत्रयी) पर महत्वपूर्ण भाष्य लिखे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने विवेकचूड़ामणि, आत्मबोध, मनीषा पंचकम् और सौंदर्य लहरी जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ रचे। सिर्फ 32 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जितना किया, वह सदैव ही याद रखा जाएगा। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने भारत की एकता और सांस्कृतिक अखंडता को बनाए रखने के लिए चारों दिशाओं में चार मुख्य मठों की स्थापना की।

 उमाशंकर ने कहा कि आदि शंकराचार्य जी ने मंदिरों में पूजा-पद्धति और पुजारियों के लिए अनेकों परम्परायें निर्धारित की, जिनके अनुसार, उत्तर भारत के बद्रीनाथ में दक्षिण भारत के नंबूदिरी ब्राह्मणों को पुजारी के रूप में नियुक्त किया। दक्षिण भारत के रामेश्वरम में पूजा के लिए उत्तर भारतीय (मुख्य रूप से महाराष्ट्र या अन्य उत्तर-दक्षिण क्षेत्रों के) ब्राह्मणों को नियुक्त करने की परंपरा स्थापित की।

इस तरह, उन्होंने विपरीत' या 'भिन्न' क्षेत्रों के पुजारियों को दूसरे क्षेत्रों में पूजा करने का अधिकार देकर भारत को एक सूत्र में पिरोने का काम किया, जिसे आज भी कई मंदिरों में (जैसे बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी का दक्षिण भारतीय होना) देखा जा सकता है। साथ ही किस मंदिर में किस दिशा से लाये हुये जल से पूजा होगी इसकी भी परम्परायें स्थापित कीं।

कार्यक्रम के आखिरी में मातृभाषा मंच के अध्यक्ष पूर्व पुलिस महानिदेशक राउत ने आयोजन में पधारे सभी महानुभावों एवं अतिथियों का हृदय से आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विभिन्न भाषायी समाजों के महानुभाव उपस्थित थे।