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अवांछनीय हठ ‘शिवपूजन सहाय’ को ‘युगल किशोर शुक्‍ल’ बनाने की

  • • गूगल के पंखों पर सवार झूठ फर्राटे भरता है, सिर चढ़कर बोलता है।

  • • दंभ के मारे कुपढ़ ज्ञानी इस झूठ को फैलाने की जिद में जुटे हुए हैं।

आलेख- विजयदत्‍त श्रीधर.

सात मई, 2026 को पूर्वाह्न 10:30 बजे गूगल गुरु से सवाल किया- युगल किशोर शुक्‍ल की फोटो दीजिए। आनन-फानन जवाब में 3 फोटो प्रकट हुए। पहली फोटो कृत्रिम बुद्धिमत्‍ता (?) से तैयार की गई है। दूसरी फोटो आचार्य शिवपूजन सहाय की है। तीसरी फोटो श्रावस्‍ती, उत्‍तरप्रदेश के वकील युगल किशोर शुक्‍ल की है जो आम जनता पार्टी के नेता भी हैं। पहली फोटो कपोल कल्पित है। सच्‍चाई से उसका नाता नहीं। दूसरी फोटो प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया पर चलाई जा रही है। जबकि यह फोटो पं. युगल किशोर शुक्‍ल की नहीं, आचार्य शिवपूजन सहाय की है। वे हिन्‍दी के मूर्धन्‍य संपादक और साहित्‍यकार हैं। राष्‍ट्रभाषा परिषद बिहार के प्रमुख रहे हैं। उनके कार्यकाल में हिन्‍दी के श्रेष्‍ठ ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। आचार्य जी के सुपुत्र डा. मंगलमूर्ति अभी लखनऊ में निवास करते हैं। उन्‍होंने अपने पिता का समाचारपत्र-पत्रिका संग्रह माधवराव सप्रे स्‍मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्‍थान, भोपाल को भेंट किया है।
एशिया में पत्रकारिता एवं जनसंचार के पहले और सबसे बड़े शिक्षण संस्‍थान ‘ माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के सामने एक पोस्‍टर लगाया गया है। इसमें ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ पत्र के चित्र के साथ आचार्य शिवपूजन सहाय का फोटो युगल किशोर शुक्‍ल के रूप में चस्‍पा किया गया है। नीचे कैप्‍शन लिखा गया है- “भारत के पहले हिन्‍दी समाचारपत्र ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ की शुरुआत 30 मई, 1826 को कानपुर के पंडित जुगल किशोर शुक्‍ल ने की थी। 30 मई को प्रतिवर्ष हिन्‍दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है।” बाँयी ओर पोस्‍टर लगाने वाले का नाम अंकित है- “पत्रकारिता विभाग (मा.च.रा.प.वि.वि. भोपाल)”। आश्‍चर्य की बात यह भी है कि उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड के प्रकाशन स्‍थल कोलकाता का उल्‍लेख करने की जरूरत पोस्‍टर बनाने वालों ने नहीं समझी।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय 8-10 मई को ‘प्रणाम उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ संविमर्श का वृहद आयोजन वीर भारत न्‍यास की सरपरस्‍ती में कर रहा है। इस संदर्भ में विश्‍वविद्यालय के ओजस्‍वी और उत्‍साही कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी लगातार सोशल मीडिया पर हिन्‍दी के प्रथम समाचारपत्र ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ पर मर्मस्‍पर्शी आलेख जारी कर रहे हैं। वे स्‍पष्‍ट रूप से यह तथ्‍य घोषित करते हैं कि “हिन्‍दी पत्रकारिता के प्रथम पुरुष युगलकिशोर शुक्‍ल का कोई चित्र उपलब्‍ध नहीं है।” दशकों से किए जा रहे उनके चित्र और उनसे संबंधित विस्‍तृत विवरण को खोजने के प्रयास आजतक सफल नहीं हो सके हैं। विश्‍वविद्यालय के पिछले सत्रारंभ समारोह में पत्रकारिता का विद्यार्थी होने के नाते मुझे बोलने का अवसर दिया गया था। तब मैंने यह तथ्‍य रेखांकित किया था कि पंडित युगल‍ किशोर शुक्‍ल का कोई चित्र नहीं खोजा जा सका है। उनके स्‍थान पर जो चित्र सोशल मीडिया पर गूगल के नाम पर फैलाया जा रहा है वह हिन्‍दी के स्‍वनामधन्‍य संपादक-साहित्‍यकार आचार्य शिवपूजन सहाय का है। इसके बाद भी विश्‍वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के पोस्‍टर में चित्र का फर्जीवाड़ा किया जाना अनर्गल है, अवांछनीय है, अनावश्‍यक है, अनैतिक है और गूगल के संदर्भ को ‘अंतिम सत्‍य’ मानने की जिद है तथा अहंकार है। यह पत्रकारिता के महान पुरखों के साथ अपवित्र खिलवाड़ भी है।

माना कि‍ गूगल संदर्भ की दृष्टि से उपयोगी माध्‍यम है। परंतु उससे प्राप्‍त जानकारी की किसी अन्‍य स्रोत से प्रतिपुष्टि करना अपरिहार्य है। प्रतिपरीक्षण करने से ही तथ्‍यों की प्रामाणिकता स्‍थापित होती है। गूगल की संदर्भ जुटाने की प्रक्रिया में जिस स्रोत से जैसी सामग्री मिले, वह अपलोड कर दी जाती है। उसके प्रमाणीकरण की कोई प्रक्रिया नहीं है। इसलिए परिशुद्धता की कोई गारंटी भी नहीं है।

राष्‍ट्रीय पुस्‍तक न्‍यास की पत्रिका ‘पुस्‍तक संस्‍कृति’ में उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड पर आलेख का प्रकाशन करते हुए आचार्य शिवपूजन सहाय का चित्र लगाया गया था। इस तथ्‍यात्‍मक त्रुटि की ओर संपादक दीपक गुप्‍ता का ध्‍यान आकर्षित करने पर उन्‍होंने ‘भूल सुधार’ का प्रकाशन कर दिया था।

मई, 2026 के ‘नवनीत’ में हिन्‍दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्‍य में बहुत अच्‍छी सामग्री का प्रकाशन किया गया है। संपादक विश्‍वनाथ सचदेव हिन्‍दी के सुधी संपादकों में से एक हैं। परंतु पत्रिका का कवर डिजाइन करने वालों ने गूगल गुरु की शरण ली और मुख पृष्‍ठ पर ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ के साथ आचार्य शिवपूजन सहाय को जोड़ दिया।

सात मई, 2026 को सुबह सवेरे जोशीले पत्रकार प्रिंस राजेश गावा की पोस्‍ट पढ़ने को मिली- “ उदन्‍त मार्तण्‍ड से डिजिटल दौर तक : हिन्‍दी पत्रकारिता का अद्भुत सफर” । एक तो इसमें मार्तण्‍ड से आधा ‘त’ गायब कर दिया गया। सही शब्‍द है ‘मार्त्‍तण्‍ड’। लेकिन अधिकांश लिखने वाले अशुद्ध ही लिखते हैं। दूसरे उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड के चित्र के साथ-साथ आचार्य शिवपूजन सहाय का चित्र चस्‍पा किया गया है।

समस्‍या की जड़ में लिखने वालों की अध्‍ययनशीलता की कमी मुख्‍य कारण है। पढ़ने-गुनने-लिखने की त्रयी बिखर गई है। जिन आयोजनों में तथ्‍य प्रकाश में आते हैं, उनमें लिखने वाले देह से तो उपस्थि‍त रहते हैं परंतु उनका मन और मस्तिष्‍क कहीं और विचरण कर रहा होता है। संकट यह भी है कि गूगल को हर ज्ञान का रामबाण मान लिया गया है। एक अदद स्‍मार्ट फोन से आगे अब विद्या और संदर्भ की यात्रा नहीं होती। सबसे बुरी बीमारी दंभ की है कि हमने जो लिख दिया सो लिख दिया। हमने जो कह दिया सो कह दिया। यह चिंता कोई नहीं पालता कि भावी पीढि़यों के लिए हम कैसा अधकचरा ज्ञान परोस कर जा रहे हैं। गलत लिखने और बोलने पर शर्मिंदगी महसूस करना अब स्‍वभाव में नहीं बचा।

हिन्‍दी के आद्य संपादक युगल किशोर शुक्‍ल के नाम के साथ भी यही हो रहा है। उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड के अंतिम पृष्‍ठ पर सबसे नीचे प्रिंट लाइन इस प्रकार छपती थी- “युगल किशोर: कथयति धीर: सविनय मेतत सुकुलज वंश:। उदिते दिनकृति सती मार्त्‍तण्‍डे तद्वद्विलसती लोक उदन्‍ते।”... इससे यह तो समझ में आता ही है कि संपादक का उन्‍हीं के द्वारा लिखा गया सही नाम युगल किशोर शुक्‍ल है। बांग्‍ला में ‘युगल’ को ‘जुगल’ बोला जाता है। जैसे हिन्‍दी का ‘युगान्‍तर’ बांग्‍ला में ‘जुगान्‍तर’ हो जाता है। ‘यमुना’ को ‘जमुना’ कहने का चलन भी है। परंतु दिलचस्‍प जानकारी यह भी है कि युगल किशोर शुक्‍ल का हस्‍ताक्षर अंग्रेजी में मिला है, जिसमें उन्‍होंने jugal Kishore shukul लिखा है। परंतु यह द्वंद्व का कोई विषय नहीं।

ऐसे ही एक गूगल ज्ञानी ने पत्रकारिता की एक बड़ी सभा में दादा माखनलाल चतुर्वेदी के ‘कर्मवीर’ को 1918 में पैदा कर दिया। पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी के महान चिंतक-संपादक, राष्‍ट्रीय काव्‍यधारा के महाकवि और स्‍वाधीनता आंदोलन के बड़े सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी की भव्‍य प्रतिमा स्‍थापित है। कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी के नवाचारी संस्‍कार ने प्रतिमा के स्‍तंभ पर चारों ओर अनुपम शिलालेख लगाए हैं। ‘कर्मवीर’ का बड़ा चित्र भी विश्‍वविद्यालय की अद्भुत समाचारपत्र प्रदर्शनी में शामिल है। माखनलाल जी और कर्मवीर पर पिछले कई दशकों में अनेक प्रामाणिक प्रकाशन हुए हैं। स्‍फुट आलेख और व्‍याख्‍यान भी निरंतर यत्र-तत्र-सर्वत्र होते रहते हैं। परंतु बलिहारी दंभ की कि सही संदर्भ ग्रहण नहीं करने की ज्ञानियों ने कसम खा रखी है। ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन 17 जनवरी, 1920 को जबलपुर से कृती-व्रती माधवराव सप्रे और विष्‍णुदत्‍त शुक्‍ल के संकल्‍प के परिणामस्‍वरूप आरंभ हुआ। माखनलाल चतुर्वेदी ने संपादन का दायित्‍व संभाला। माखनलाल जी मध्‍यप्रांत में महात्‍मा गांधी के असहयोग आंदोलन के पहले सत्‍याग्रही थे। उनके जेल जाने के बाद ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन स्‍थगित हुआ, फिर बंद हुआ। 4 अप्रैल, 1925 को माखनलाल जी ने खंडवा से ‘कर्मवीर’ का दुबारा संपादन-प्रकाशन आरंभ किया।

एक झूठ यह भी फैलाया जा रहा है कि मध्‍यप्रांत के पहले मुख्‍यमंत्री का चयन पर्ची डालकर हुआ था। पर्ची में एक नाम माखनलाल जी का भी था। यह सरासर झूठ है। सन 1937 में पहली बार भारत में अंग्रेजी शासन के अंतर्गत प्रांतीय विधानसभाओं का चुनाव हुआ। मध्‍यप्रांत में कांग्रेस संसदीय बोर्ड के प्रमुख माखनलाल चतुर्वेदी थे। उनके खिलाफ षड्यंत्र हुआ। मैनीपुलेशन का आरोप लगाया गया। राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व तक शिकायत पहुँचाई गई। उस समय मध्‍यप्रांत में कांग्रेस के सर्वप्रमुख नेता माखनलाल चतुर्वेदी थे। रतौना कसाईखाना की योजना निरस्‍त करने के लिए फिरंगी हुकूमत को विवश करने का श्रेय उन्‍हें प्राप्‍त था। 1923 के झण्‍डा सत्‍याग्रह के वे सफल सेनापति थे। 18 फरवरी, 1922 को बिलासपुर जेल में माखनलाल जी ने ‘पुष्‍प की अभिलाषा’ की रचना की थी, जो स्‍वाधीनता आंदोलन का प्रयाणगीत बन गई थी। वे मध्‍यप्रांत के मुख्‍यमंत्री न बन पाएँ, इस वजह से उन्‍हें षड्यंत्र का शिकार बनाया गया था। उसके बाद से दादा माखनलाल चतुर्वेदी कांग्रेस की राजनीति से विमुख हो गए थे। याद करिए उनकी मशहूर टिप्‍पणी- “ राजनीति जब तक मजहब रही, तब तक मैंने की। जब से धंधा बन गई मैंने राजनीति से किनारा कर लिया।” उसके बाद केवल त्रिपुरी कांग्रेस (1939) में वे शामिल हुए। कांग्रेस की राजनीति में नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और माधवराव सप्रे समाचार पत्र और शोध संस्थान के संस्थापक निदेशक है।)