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भीम बैठका से लाखों साल पीछे की यात्रा के प्रथम पथिक-भारतीय पुरातत्व के भीष्म पितामह डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर

( आलेख-अरविंद ठाकुर, इंदौर)                                                                                                                                                                                                                                                                                            
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर मध्यप्रदेश की उन रहस्यमयी पहाड़ियों में एक शख्स ट्रेन से उतरने की जिद न करता, तो शायद भारत का पाषाण कालीन इतिहास आज भी अंधेरे में छिपा होता? वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर थे, जिन्हें भारतीय पुरातत्व का 'भीष्म पितामह' कहा जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन पत्थरों की जुबान समझने और भारत के उस अतीत को खोजने में लगा दिया, जिसका कोई लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं था। उनका जन्म 1919 में नीमच में हुआ था और वे बचपन से ही कला, पेंटिंग और इतिहास के प्रति एक अनोखा जुनून रखते थे। उनके इस सफर की शुरुआत किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, जहाँ एक आम इंसान अपनी जिद और जुनून के दम पर पूरी दुनिया के सामने इतिहास का सबसे बड़ा पन्ना खोल देता है।



यह साल 1957 की बात है, जब डॉ. वाकणकर ट्रेन से भोपाल जा रहे थे। होशंगाबाद के पास अचानक ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उनकी नजर दूर विंध्य की पहाड़ियों पर पड़ी, जहाँ पत्थरों के कुछ अजीब और विशाल ढांचे खड़े थे। उनकी पारखी नजरों को तुरंत अहसास हो गया कि ये कोई आम चट्टानें नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर आदिमानव का कोई गहरा राज छिपा है। वे बिना किसी देरी के अगले ही स्टेशन पर ट्रेन से उतर गए और उन बीहड़ जंगलों की तरफ पैदल ही निकल पड़े। स्थानीय लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि उन जंगलों में शेर, चीते और खूंखार डाकुओं का बसेरा है, लेकिन इतिहास को खोजने की उनकी भूख के आगे यह डर बौना साबित हुआ। वे अकेले ही उन घने जंगलों में भटकते रहे और आखिरकार उन्होंने भीमबेटका की उन गुफाओं को खोज निकाला, जिन्होंने भारत के इतिहास को सीधे एक लाख साल पीछे धकेल दिया।



भीमबेटका को खोजना जितना बड़ा चमत्कार था, उसकी गुफाओं से सच बाहर निकालना उससे भी कहीं ज्यादा कठिन और संघर्षपूर्ण था। उस दौर में डॉ. वाकणकर के पास न तो कोई बड़ा सरकारी फंड था और न ही आज जैसी आधुनिक मशीनें या गाड़ियाँ थीं। वे कई-कई हफ्तों तक उन गुफाओं में भूखे-प्यासे रहकर, कड़कड़ाती ठंड और चिलचिलाती धूप में पत्थरों की खाक छानते थे। वे अपने हाथों से मिट्टी हटाते, घंटों एक ही मुद्रा में बैठकर गुफा की छतों पर बनी धुंधली तस्वीरों को अपनी डायरी में स्केच करते थे ताकि आदिमानव की उस कला को दुनिया को दिखाया जा सके। कई बार उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जेब से खर्च करके और रूखी-सूखी रोटी खाकर भी अपनी इस साधना को कभी टूटने नहीं दिया। उनकी इस अकल्पनीय मेहनत का ही नतीजा था कि भीमबेटका को बाद में यूनेस्को (UNESCO) द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया।

नीमच में 4 मई सन् 1919 को जन्मे डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर उन विद्वानों, आचार्यों की श्रेणी के थे, जिन्होंने कभी भौतिक साधनों को अर्जित नहीं किया और समाज में महान होने का मुकुट धरण नहीं किया. 4000 से अधिक शैल चित्रों की खोज करने वाले भारती कला भवन, ललित कला भवन, पुरातत्व उत्खनन शैली, चित्र शोध संस्थान के संपादक वाकणकर जीवन भर एक सन्यासी के समान रहे।

डॉ. वाकणकर का योगदान सिर्फ भीमबेटका की गुफाओं तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारत की सबसे पवित्र और रहस्यमयी नदी सरस्वती के अस्तित्व को खोजने में भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। जब दुनिया यह मान चुकी थी कि सरस्वती सिर्फ एक पौराणिक कथा है, तब वाकणकर साहब ने अपनी उम्र की परवाह न करते हुए एक विशाल खोजी अभियान शुरू किया। उन्होंने उपग्रह (सैटेलाइट) की तस्वीरों का अध्ययन किया और भीषण गर्मी में राजस्थान तथा गुजरात के रेगिस्तानों में हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा की। उन्होंने जमीन के नीचे दबे उन प्राचीन रास्तों को खोज निकाला जहाँ कभी सरस्वती नदी बहा करती थी, जिसने भारतीय सभ्यता के भौगोलिक इतिहास को एक नया दृष्टिकोण दिया। उन्होंने यह साबित किया कि हमारी सभ्यता सिर्फ सिंधु नदी के किनारे नहीं, बल्कि सरस्वती के तट पर भी फली-फूली थी।



डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर एक ऐसे सच्चे शोधकर्ता थे जिन्होंने कभी नाम, पैसा या ऐशो-आराम की चाह नहीं की। वे अक्सर कहा करते थे कि पुरातत्व की खोज दफ्तरों या वातानुकूलित कमरों में बैठकर नहीं, बल्कि तपती धूप और धूल भरे मैदानों में फावड़ा चलाकर होती है। वे एक बेहतरीन चित्रकार भी थे, इसलिए वे गुफाओं की पेंटिंग्स के महत्व को केवल एक पुरातत्वविद् की नजर से नहीं बल्कि एक कलाकार के दिल से समझते थे। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक भारत के गौरव को दुनिया के सामने लाने के लिए काम किया और 1988 में इस दुनिया से विदा हो गए। आज जब भी हम भीमबेटका की उन लाल-सफेद दीवारों पर दौड़ते हुए हिरणों और शिकार करते आदिमानवों को देखते हैं, तो वह असल में डॉ. वाकणकर की उसी अटूट निष्ठा और संघर्ष की कहानी बयां कर रहे होते हैं।

सिंगापुर के अंतिम व्याख्यानमाला में उन्होने कहा कि हमारे पूर्वजों ने हिमालय को पार कर नये प्रदेश की खोज, शोषण या दोहन के लिये नहीं की। अपितु आर्य बनाने के लिये की थी. हमारी एक ही कामना है कि विश्व भर के लोग एक साथ रहें, एक साथ ही परमध्येय मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयास करें।