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संतों से समझना होगा भगवत् कृपा का मर्म - सुश्री धामेश्वरी देवीजी

भोपाल ।  जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख एवं वरिष्ठ प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी द्वारा भोपाल शहर के मीनाल रेजीडेंसी में प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 2 से 12 मई तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से 8:30 तक हो रहा है। श्रृंखला के तीसरे दिन देवी जी ने वेदों शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि सर्वान्तरयामी सर्वशक्तिमान भगवान् को बुद्धि के द्वारा बड़े बड़े ज्ञानी तो क्या ब्रम्हा, विष्णु, शंकर भी नहीं जान सकते क्योंकि भगवान् बुद्धि से परे है,मायातीत है। जबकि हमारे मन बुद्धि मायिक हैं, प्राकृत हैं। सभी जीव माया के गुणों के आधीन है इसलिए क्षुद्ध शक्ति युक्त हैं लेकिन भगवान् माया से परे है, दिव्य है, शाश्वत है।


 इसके अतिरिक्त भगवान् अनंत विरोधी धर्मों के अधिष्ठान भी हैं यथा भगवान् छोटे से भी छोटा है, और भगवान् बडे़ से भी बड़ा है, वो धर्म से परे है, अधर्म से भी परे है, सृष्टि से परे है किन्तु सृष्टिकर्ता भी है, अकर्ता है किन्तु न्यायकर्ता भी है, कृपाकर्ता भी है, भगवान् से भय भी भयभीत होता है किन्तु वही भगवान् यशोदा मैया की छड़ी से डरते हैं। भगवान् को बड़े बडे़ ऋषि मुनि महात्मा अपने पराक्रम से नहीं जान सकते।

भगवान् आत्माराम, पूर्णकाम है किन्तु ब्रजगोपियों के साथ रास भी करते हैं इसलिए ऐसे भगवान् को जानना बुद्धि से असंभव है। बुद्धि से भगवान् को जाना नहीं जा सकता परंतु यदि किसी पर भगवान् की कृपा हो जाये और भगवान् की बुद्धि (दिव्य शक्ति) उसे मिल जाये, तो साधारण मनुष्य भी भगवान् को जान सकता है।

विश्व के अधिकांश महानुभाव यह कह दिया करते हैं कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता। कुछ लोग कोटेशन आदि के द्वारा प्रत्येक कर्म के लिए भगवान् को जिम्मेदार ठहराते हैं। उसे जैसा करना होता है, करा लेता है, किन्तु यह बात गलत है। ईश्वर ने हमें मनुष्य देह दिया, कर्म करने की शक्ति दी। चाहे हम अच्छे कर्म करें, चाहे बुरे कर्म। भगवान् उन कर्मों को नोट करता है फिर उन कर्मों के अनुसार हमें फल देता है।



भगवान् ने हमें सत्कर्म करने की शक्ति दी है किंतु उसकी दी हुई शक्तियों का हम दुरुपयोग करते हैं। यानि संसार में आसक्ति करते हैं और फिर कह देते हैं, हमारे भाग्य में नहीं है अथवा भगवान् को दोषी ठहराते हैं। मनुष्य देह प्राप्त करके ईश्वर की भक्ति करने की बजाय संसार की जिम्मेदारियों की आड़ लेते हैं।

वास्तव में भगवान् की कृपा का सही अर्थ समझना होगा, शास्त्रों से और संतो से। भगवद् कृपा के बिना भगवान् को नहीं जाना जा सकता। भगवान् की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है। देवीजी ने यह भी बताया कि सगुण साकार भगवान् ही कृपा करता है इनकी कृपा के बिना किसी की भी माया-निवृत्ति नहीं हो सकती।