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आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों ने भाषाओं को धर्म से जोड़ने की साजिश की: सोहेल हाशमी

  • उर्दू इसी जमीन पर जन्मी मेलमिलाप की जुबान है : वक़ार सिद्दीकी की किताब 'शहर ए सुख़न' के विमोचन पर बोले सुहेल हाशमी, मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम

ग्वालियर। 94 वर्षीय शायर,उर्दू अदब के इतिहासकार वक़ार सिद्दीकी की ग्वालियर के उर्दू अदब के चार सौ साल के इतिहास पर केन्द्रित किताब " शहर ए सुख़न " का विमोचन होटल लैंडमार्क में गरिमामय कार्यक्रम में किया गया।



इस अवसर पर जन इतिहासकार और फिल्मकार सुहैल हाशमी, शायर आमिर फारुकी, किताब के सम्पादक भगवान स्वरूप चैतन्य, लोकजतन सम्पादक बादल सरोज एवं वक़ार सिद्दीकी स्वयं मौजूद थे। वरिष्ठ शायर कासिम रजा की अध्यक्षता में हुए इस विमोचन समारोह में वक्ताओं ने ग्वालियर में उर्दू अदब के इतिहास को किताब की शक़्ल में दर्ज करने के लिए वक़ार सिद्दीकी साहब की सराहना की।

इस मौके पर सोहेल हाशमी ने उर्दू की पैदाइश की कहानी सुनाई और इसे इसी जमीन पर अवाम, उनकी जुबान3 और साथ के मेलमिलाप से जन्मी भाषा बताया। भाषा को धर्म से जोड़ने की अंग्रेजों की साजिश का खुलासा करते उन्होंने हुए कहा कि दुनिया में कहीं भी भाषाएं धर्म से संबद्ध नहीँ है। आजादी की लड़ाई के समय की गयी यह साजिश भाषाओं को नुकसान पहुँचाती है और अंतत: देश को भी। मुख्य वक्ता के रूप में सुहैल हाशमी ने उर्दू के इतिहास की सिलसिलेवार जानकारी दी।



किताब का परिचय कराते हुए वरिष्ठ शायर आमिर फ़ारूक़ी ने कहा कि यह बहस बेमानी है कि उर्दू दिल्ली की है, लखनऊ की है या हैदराबाद की। ग्वालियर का उर्दू और अदब से बहुत पुराना रिश्ता है। सम्पादक भगवान स्वरूप चैतन्य ने दावा किया कि उर्दू का जन्म ग्वालियर में हुआ है। लोकजतन सम्पादक बादल सरोज ने वक़ार सिद्दीकी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला।

विमोचन समारोह में शायर मदनमोहन दानिश, रश्मि सबा, पवन करण, अतुल अजनबी, सामाजिक कार्यकर्ता केशव पांडेय सहित अनेक गणमान्य नागरिक और साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन मान्यता सरोज ने किया। आभार प्रदर्शन मधुलिका जी ने किया। परिचय तन्मय धर ने दिया।