मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि मैं सनातन धर्म को इसलिए सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता क्योंकि मैं सनातनी परिवार में पैदा हुआ। मैं धर्मों का यथासंभव तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद यह कहने की स्थिति में आया कि सनातन धर्म पूर्ण धर्म है। दूसरे धर्म ग़लत नहीं हैं। पर वे वहां तक नहीं पहुंचे जहां तक सनातन धर्म पहुंचा।परमपूज्य श्री रामकृष्ण परमहंसदेव ने प्रैक्टीकल करके यह सिद्ध किया कि अन्य धर्म भी सत्य की ओर ले जाते हैं।परंतु अन्य धर्म नदियों पर रुक गये।सनातन और आगे गया और समुद्र तक पहुंचा जहां से सारी नदियां उत्पन्न हो रही हैं और उसी में समा भी रहीं हैं।
सनातन धर्म की आधारशिला है कर्म का सिद्धांत।यह सिद्धांत सनातनियों की आत्मा में समाया हुआ है।धर्मग्रंथों से निकलकर कर्म का सिद्धांत कहावतों किंवदंतियों मुहावरों तक फैला हुआ है।जो व्यक्ति धर्म के बारे में ज्यादा कुछ न भी जानता हो वह भी कम से कम इतना तो कह ही देता है-
जैसी करनी वैसी भरनी
कर्मों का फल भोगना पड़ता है
बोआ पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाय
सनातन धर्म के असंख्य धर्मग्रंथों का सार संक्षेप जनमानस ने इस तरह ग्रहण किया-
चार वेद छः शास्त्र में बात मिलीं हैं दोय
दुख दीने दुख होत है सुख दीने सुख होय
विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइजक न्यूटन ने 1687 में प्रकाशित अपने शोध ग्रंथ-"फिलासोफी नेचुरलिस्ट प्रिंसीपिया मैथेमेटिका"- में सर्वप्रथम क्रिया और प्रतिक्रिया का नियम प्रतिपादित किया था-
There is an equal and opposite reaction to every action.
(हर क्रिया की एक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है)
परंतु बिल्कुल यही बात सबसे पहले लिखित रूप में बृहदारण्यक उपनिषद् में आती है कि हर कर्म का एक फल है।बृहदारण्यक उपनिषद ने 'प्रतिक्रिया' न कहकर 'फल' कहा।केवल शब्दों का अंतर है।फल जो है वह एक प्रतिक्रिया ही तो है।वैज्ञानिकों/पुरातत्त्वविदों ने बृहदारण्यक उपनिषद का समय 900 वर्ष ईसापूर्व निर्धारित किया है।यह सिद्धांत तो अनादिकाल से है लेकिन उसका लिखित स्वरूप भी न्यूटन से 2500-2600 साल पुराना है।मतलब हम न्यूटन से ढ़ाई हजार साल पहले से यह बात कहते आ रहे थे लेकिन चूंकि उस समय भारत की अवनति का समय था इसलिए ऐसा माना गया जैसे न्यूटन ने कोई नयी मौलिक बात खोजी हो।
और फिर न्यूटन का जो क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम है वह अधूरा है। न्यूटन क्रिया की केवल एक प्रतिक्रिया पर ही रुक जाते हैं।जबकि प्रतिक्रिया भी एक क्रिया ही है इसलिए प्रतिक्रिया की भी प्रतिक्रिया होती है फिर उसकी भी प्रतिक्रिया होती है और यह प्रक्रिया अंतहीन रुप से चलती रहती है।मतलब हर क्रिया प्रतिक्रियाओं की एक अंतहीन श्रृंखला को जन्म देती है।हमारे उपनिषदों में वर्णित कर्म का सिद्धांत यही कहता है और हम अपने दैनंदिन जीवन में इसे देखते भी हैं।किसी के दादा परदादा ने कुछ किया था और उसका अच्छा बुरा परिणाम हमें कई पीढ़ियों के बाद भी देखने मिलता है।इसी बात को एक शे'र में कहा गया है-
कुछ वाकये ऐसे भी तारीख में गुज़रे हैं
जब लम्हों ने ख़ता की है और सदियों ने सज़ा पायी है
दूसरे गैर भारतीय धर्मों में अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं।वे यह नहीं बता पाते कि मनुष्य दुखी क्यों है? कोई साधनहीन होते हुए भी सुखी है और कोई साधन-संपन्न होते हुए भी दुखी क्यों हैं?वे बस इतना कह पाते हैं कि ईश्वर की मर्जी।इन प्रश्नों का बिल्कुल सटीक और विज्ञान सम्मत उत्तर सनातन धर्म में मिलता है-प्रारब्ध भोग के कारण।और उसके निवारण के उपाय भी सनातन बताता है।
इस अवसर पर महाभारत का एक प्रसंग याद आता है।शरशैय्या पर पड़े पितामह भीष्म ने श्रीकृष्ण से पूछा कि मैंने जीवन भर धर्माचरण किया फिर मेरी यह हालत क्यों हुई? कृष्ण भगवान ने कहा कि पूर्व जन्मों के कर्म का फल होगा।पितामह भीष्म ने कहा कि मैं अपने पिछले 100 जन्मों को खंगाल चुका हूं पर ऐसा कोई आचरण नज़र नहीं आता। श्रीकृष्ण ने कहा थोड़ा और पीछे जाओ। पितामह 100 जन्मों के पीछे गये तब उन्हें उत्तर मिला। एक जन्म में उन्होंने एक सर्प को तीर से उठाकर फेंक दिया था।वह सर्प एक कंटीली झाड़ी पर गिरा और उसका शरीर कांटों से बिध गया। उसने उसी हालत में तड़प तड़पकर प्राण त्याग दिये। उनके उसी कर्म का फल इस जन्म में शरशैय्या के रूप में मिला था।कर्म बीज है उससे वृक्ष और अंततः फल आते हैं।फल के भीतर कई गुना अधिक बीज होते हैं जो पुनः नये वृक्षों और नये फलों को जन्म देते हैं।इस तरह एक नन्हा सा बीज पूरे जंगल का निर्माण करने की शक्ति और प्रवृत्ति रखता है।बृहदारण्यक उपनिषद् के बाद फिर श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म सिद्धांत प्रमुखता से मिलता है।श्रीमद्भगवद्गीता भी पांच हजार साल पुरानी है।
कर्म बंधन में डालते हैं क्योंकि वे क्रिया-प्रतिक्रिया के चक्र में जीव को फंसा देते हैं।अब सवाल यह है कि इस चक्र से जीव मुक्त कैसे हो?
भारतीय साधना पद्धतियां इस समस्या के दो समाधान सुझातीं हैं-
जब किसान किसी हानिकारक पौधे जैसे गाजर घास इत्यादि से परेशान होते हैं तो वे उसमें फल तथा बीज आने के पहले ही उसे उखाड़ देते हैं ताकि अगले साल उससे नये पौधे उत्पन्न न हो सकें।यह जैन साधना पद्धति है।उनका जोर कर्मों के क्षय पर है। कर्मों को उखाड़ डालो।
आजकल कृषि वैज्ञानिकों ने टर्मीनेटर बीजों का आविष्कार किया है।इन बीजों से पौधा उगेगा उसमें फल आयेंगे।फलों में सारे पोषक तत्व भी रहेंगे लेकिन इन फलों में जो बीज रहेंगे उनसे दोबारा फसल नहीं ली जा सकती।मतलब उन बीजों में प्रजनन क्षमता नहीं होती।यही पद्धति श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण भगवान बताते हैं।वे कहते हैं निष्काम कर्म करो।बिना फल की इच्छा के कर्म करो।श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुनिया में आये हैं तो हम बिना कर्म किए नहीं रह सकते।बहुत थोड़े साधु संन्यासी ही ऐसे हो सकतें हैं जो सबकुछ छोड़ छाड़कर जंगल में चले जाएं और नये कर्मों का निर्माण रोक दें।लेकिन जो अधिकांश लोग घर गृहस्थी में रह रहे हैं वे बिना कर्म के कैसे गुज़ारा करेंगे?तो उनके लिए है निष्काम कर्म।खूब कर्म करो पर फल भगवान पर छोड़ दो।फल की इच्छा त्याग देने का मतलब है टर्मीनेटर बीज का निर्माण।वह बीज नये बीज को जन्म नहीं देगा।श्रृंखला टूट जायेगी और हम चक्र से बाहर निकल आयेंगे।श्रीकृष्ण का सिद्धांत आम आदमियों के लिए है जो साधु-संत बनने की योग्यता,क्षमता और इच्छा शक्ति नहीं रखते।
मैं तो कहूंगा कि श्रीकृष्ण सबसे बड़े लोकतांत्रिक हैं जो दीन दुखी निर्बल साधारण इंसान को भी मुक्ति का सहज सरल उपाय बताते हैं।

जैसी करनी वैसी भरनी
कर्मों का फल भोगना पड़ता है
बोआ पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाय
सनातन धर्म के असंख्य धर्मग्रंथों का सार संक्षेप जनमानस ने इस तरह ग्रहण किया-
चार वेद छः शास्त्र में बात मिलीं हैं दोय
दुख दीने दुख होत है सुख दीने सुख होय
विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइजक न्यूटन ने 1687 में प्रकाशित अपने शोध ग्रंथ-"फिलासोफी नेचुरलिस्ट प्रिंसीपिया मैथेमेटिका"- में सर्वप्रथम क्रिया और प्रतिक्रिया का नियम प्रतिपादित किया था-
There is an equal and opposite reaction to every action.
(हर क्रिया की एक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है)
परंतु बिल्कुल यही बात सबसे पहले लिखित रूप में बृहदारण्यक उपनिषद् में आती है कि हर कर्म का एक फल है।बृहदारण्यक उपनिषद ने 'प्रतिक्रिया' न कहकर 'फल' कहा।केवल शब्दों का अंतर है।फल जो है वह एक प्रतिक्रिया ही तो है।वैज्ञानिकों/पुरातत्त्वविदों ने बृहदारण्यक उपनिषद का समय 900 वर्ष ईसापूर्व निर्धारित किया है।यह सिद्धांत तो अनादिकाल से है लेकिन उसका लिखित स्वरूप भी न्यूटन से 2500-2600 साल पुराना है।मतलब हम न्यूटन से ढ़ाई हजार साल पहले से यह बात कहते आ रहे थे लेकिन चूंकि उस समय भारत की अवनति का समय था इसलिए ऐसा माना गया जैसे न्यूटन ने कोई नयी मौलिक बात खोजी हो।
और फिर न्यूटन का जो क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम है वह अधूरा है। न्यूटन क्रिया की केवल एक प्रतिक्रिया पर ही रुक जाते हैं।जबकि प्रतिक्रिया भी एक क्रिया ही है इसलिए प्रतिक्रिया की भी प्रतिक्रिया होती है फिर उसकी भी प्रतिक्रिया होती है और यह प्रक्रिया अंतहीन रुप से चलती रहती है।मतलब हर क्रिया प्रतिक्रियाओं की एक अंतहीन श्रृंखला को जन्म देती है।हमारे उपनिषदों में वर्णित कर्म का सिद्धांत यही कहता है और हम अपने दैनंदिन जीवन में इसे देखते भी हैं।किसी के दादा परदादा ने कुछ किया था और उसका अच्छा बुरा परिणाम हमें कई पीढ़ियों के बाद भी देखने मिलता है।इसी बात को एक शे'र में कहा गया है-
कुछ वाकये ऐसे भी तारीख में गुज़रे हैं
जब लम्हों ने ख़ता की है और सदियों ने सज़ा पायी है
दूसरे गैर भारतीय धर्मों में अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं।वे यह नहीं बता पाते कि मनुष्य दुखी क्यों है? कोई साधनहीन होते हुए भी सुखी है और कोई साधन-संपन्न होते हुए भी दुखी क्यों हैं?वे बस इतना कह पाते हैं कि ईश्वर की मर्जी।इन प्रश्नों का बिल्कुल सटीक और विज्ञान सम्मत उत्तर सनातन धर्म में मिलता है-प्रारब्ध भोग के कारण।और उसके निवारण के उपाय भी सनातन बताता है।
इस अवसर पर महाभारत का एक प्रसंग याद आता है।शरशैय्या पर पड़े पितामह भीष्म ने श्रीकृष्ण से पूछा कि मैंने जीवन भर धर्माचरण किया फिर मेरी यह हालत क्यों हुई? कृष्ण भगवान ने कहा कि पूर्व जन्मों के कर्म का फल होगा।पितामह भीष्म ने कहा कि मैं अपने पिछले 100 जन्मों को खंगाल चुका हूं पर ऐसा कोई आचरण नज़र नहीं आता। श्रीकृष्ण ने कहा थोड़ा और पीछे जाओ। पितामह 100 जन्मों के पीछे गये तब उन्हें उत्तर मिला। एक जन्म में उन्होंने एक सर्प को तीर से उठाकर फेंक दिया था।वह सर्प एक कंटीली झाड़ी पर गिरा और उसका शरीर कांटों से बिध गया। उसने उसी हालत में तड़प तड़पकर प्राण त्याग दिये। उनके उसी कर्म का फल इस जन्म में शरशैय्या के रूप में मिला था।कर्म बीज है उससे वृक्ष और अंततः फल आते हैं।फल के भीतर कई गुना अधिक बीज होते हैं जो पुनः नये वृक्षों और नये फलों को जन्म देते हैं।इस तरह एक नन्हा सा बीज पूरे जंगल का निर्माण करने की शक्ति और प्रवृत्ति रखता है।बृहदारण्यक उपनिषद् के बाद फिर श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म सिद्धांत प्रमुखता से मिलता है।श्रीमद्भगवद्गीता भी पांच हजार साल पुरानी है।
कर्म बंधन में डालते हैं क्योंकि वे क्रिया-प्रतिक्रिया के चक्र में जीव को फंसा देते हैं।अब सवाल यह है कि इस चक्र से जीव मुक्त कैसे हो?
भारतीय साधना पद्धतियां इस समस्या के दो समाधान सुझातीं हैं-
जब किसान किसी हानिकारक पौधे जैसे गाजर घास इत्यादि से परेशान होते हैं तो वे उसमें फल तथा बीज आने के पहले ही उसे उखाड़ देते हैं ताकि अगले साल उससे नये पौधे उत्पन्न न हो सकें।यह जैन साधना पद्धति है।उनका जोर कर्मों के क्षय पर है। कर्मों को उखाड़ डालो।
आजकल कृषि वैज्ञानिकों ने टर्मीनेटर बीजों का आविष्कार किया है।इन बीजों से पौधा उगेगा उसमें फल आयेंगे।फलों में सारे पोषक तत्व भी रहेंगे लेकिन इन फलों में जो बीज रहेंगे उनसे दोबारा फसल नहीं ली जा सकती।मतलब उन बीजों में प्रजनन क्षमता नहीं होती।यही पद्धति श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण भगवान बताते हैं।वे कहते हैं निष्काम कर्म करो।बिना फल की इच्छा के कर्म करो।श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुनिया में आये हैं तो हम बिना कर्म किए नहीं रह सकते।बहुत थोड़े साधु संन्यासी ही ऐसे हो सकतें हैं जो सबकुछ छोड़ छाड़कर जंगल में चले जाएं और नये कर्मों का निर्माण रोक दें।लेकिन जो अधिकांश लोग घर गृहस्थी में रह रहे हैं वे बिना कर्म के कैसे गुज़ारा करेंगे?तो उनके लिए है निष्काम कर्म।खूब कर्म करो पर फल भगवान पर छोड़ दो।फल की इच्छा त्याग देने का मतलब है टर्मीनेटर बीज का निर्माण।वह बीज नये बीज को जन्म नहीं देगा।श्रृंखला टूट जायेगी और हम चक्र से बाहर निकल आयेंगे।श्रीकृष्ण का सिद्धांत आम आदमियों के लिए है जो साधु-संत बनने की योग्यता,क्षमता और इच्छा शक्ति नहीं रखते।
मैं तो कहूंगा कि श्रीकृष्ण सबसे बड़े लोकतांत्रिक हैं जो दीन दुखी निर्बल साधारण इंसान को भी मुक्ति का सहज सरल उपाय बताते हैं।

(लेखक मप्र मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हैं।)
