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भारतीय संविधान में समानता का प्रावधान, लेकिन पैमाना..?

आलेख - इशांत प्रताप सिंह सेंगर.

 भारतीय संविधान के पन्नों में दर्ज ‘समानता का अधिकार’ कागजों पर जितना भव्य दिखता है, उसकी व्यावहारिक यात्रा उतनी ही विचित्र और अंतहीन भूलभुलैया जैसी रही है। अनुच्छेद 14 से 18 तक समता का जो ताना-बाना बुना गया था, वह देखने में तो ऐसा प्रतीत होता था कि समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को मुख्यधारा में खींचकर बराबर खड़ा कर देगा। मगर यह समानता कब तक अर्जित होगी और कब यह मान लिया जाएगा कि अब सब सचमुच समान हो चुके हैं, इसका कोई तय पैमाना संविधान निर्माताओं के पास भी नहीं था। परिणाम यह हुआ कि जिस सहारे को बैसाखी बनाकर खड़ा किया गया था, वह स्थाई व्यवस्था में तब्दील हो गया। आगे चलकर अनुच्छेद 15 के उपखंड (5) के जरिए सरकारी और गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए व्यापक छूट का कानूनी मार्ग प्रशस्त किया गया, क्योंकि व्यवस्था ने यह मान लिया था कि बिना इस छूट के यह वर्ग सक्षम नहीं हो सकते। इसी कड़ी में आगे चलकर अनुच्छेद 15 के उपखंड (6) के जरिए सवर्णों को रिझाने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के नाम पर 10 प्रतिशत का एक नया शगूफा भी जोड़ दिया गया, ताकि असंतोष पर थोड़ा मरहम लगाया जा सके।


आरक्षण की सीमाओं का तमाशा देखना हो तो अनुच्छेद 334 की यात्रा सबसे सटीक उदाहरण है। संविधान सभा में जब राजनीतिक प्रतिनिधित्व—यानी संसद और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण—की बात आई थी, तब बाबा साहेब आंबेडकर सहित सभी दिग्गजों ने इसके लिए केवल 10 वर्षों की मियाद तय की थी। सोचा गया था कि 1960 तक देश इतना परिपक्व हो जाएगा कि इन विशेष सीटों की जरूरत नहीं पड़ेगी। परंतु वोट बैंक के गणित ने इसे 10 से 20, 20 से 30, 40 और बढ़ाते-बढ़ाते 104वें संविधान संशोधन के जरिए पूरे 80 साल यानी 2030 तक पहुंचा दिया। इस दौरान केवल नाममात्र की उपस्थिति रखने वाले एंग्लो-इंडियन समुदाय के मनोनीत सदस्यों की व्यवस्था को बेअसर मानकर विदा कर दिया गया, लेकिन राजनीतिक सीटों का विस्तार हर दशक में निर्विरोध आगे सरकता रहा। सबसे दिलचस्प विरोधाभास यह रहा कि शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में दिए जाने वाले सामाजिक आरक्षण पर संविधान में कोई अंतिम तारीख या समय-सीमा लिखी ही नहीं गई; सीमा केवल चुनावी कुर्सियों के लिए बांधी गई थी, जिसे सियासत हर दस साल में बड़े चाव से रिन्यू करा लेती है।

इतिहास के पन्ने पलटें तो इस व्यवस्था की नींव 26 जुलाई 1902 को कोल्हापुर रियासत में पड़ी थी। ज्योतिराव फुले के विचारों से प्रेरित होकर छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने प्रशासन में गैर-ब्राह्मण जातियों के लिए 50 प्रतिशत पदों को आरक्षित करने का शाही फरमान जारी किया था, जिसका मूल उद्देश्य प्रशासन में केवल एक वर्ग के दबदबे को तोड़ना था। इसके बाद मद्रास प्रेसीडेंसी के जस्टिस पार्टी वाले कम्यूनल जी.ओ. और मैसूर के मिलर आयोग से होते हुए यह विचार आजादी के मुहाने तक पहुंचा। 26 जनवरी 1950 को जब नया संविधान लागू हुआ, तो प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर और मौलिक अधिकार समिति के कर्ताधर्ता सरदार वल्लभभाई पटेल की देखरेख में अनुच्छेद 16(4) को स्थापित किया गया। केंद्र सरकार ने सितंबर 1950 में ही एक आदेश जारी कर सीधी भर्तियों में अनुसूचित जातियों के लिए 12.5 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों के लिए 5 प्रतिशत का कोटा तय कर दिया, जिसे 1970 में बढ़ाकर क्रमशः 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत कर दिया गया।

कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की दस साल पुरानी रिपोर्ट की धूल झाड़कर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नाम पर 27 प्रतिशत आरक्षण का ऐलान कर दिया। बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की इस रिपोर्ट में जातियों के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के वर्गीकरण को लेकर कई ऐसे दावे किए गए थे, जिनका आधार तार्किक से अधिक पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों के संदर्भों से लिया गया था। योग्यता और गुणवत्ता की दुहाई देने वाले देश ने उस दौर के भीषण छात्र आंदोलनों के बावजूद इस नए सामाजिक समीकरण को स्वीकार कर लिया।

जब मामला 1992 में ‘इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ’ के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की नौ जजों की संविधान पीठ के सामने पहुंचा, तो अदालत ने साफ कह दिया कि अनुच्छेद 16(4) केवल शुरुआती भर्ती तक सीमित है, पदोन्नति (प्रमोशन) में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। अदालत ने सरकारों को व्यवस्था समेटने के लिए 5 साल की मोहलत दी। लेकिन चुनावी सियासत अदालती बंदिशों को कहां मानने वाली थी। 1995 में पी.वी. नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार ने 77वां संविधान संशोधन पारित कर अनुच्छेद 16(4A) संविधान में जोड़ दिया, जिसने पदोन्नति में भी एससी और एसटी के आरक्षण को सुरक्षित कर दिया।

इसके बाद सत्ता के रंगमंच पर आगमन हुआ भारतीय जनता पार्टी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का। वाजपेयी जी, जिनकी छवि एक कवि-हृदय राजनेता के साथ-साथ लखनऊ के चौक की गलियों में राजा की मशहूर ठंडाई और खान-पान के शौकीन के रूप में भी खूब चर्चित रही, और जिनके व्यक्तिगत जीवन तथा निजी संबंधों को लेकर सुब्रमण्यम स्वामी जैसे वरिष्ठ नेता समय-समय पर सनसनीखेज व विवादित दावे सार्वजनिक मंचों पर दोहराते रहे हैं। उसी वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2000 और 2001 के बीच संविधान संशोधनों की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित की, जिसने आरक्षण के ढांचे को अदालत के हर अंकुश से पूरी तरह मुक्त कर दिया।

सबसे पहले वाजपेयी सरकार ने 81वां संविधान संशोधन अधिनियम (2000) लाकर अनुच्छेद 16(4B) जोड़ा। इसके तहत यह नियम बना दिया गया कि यदि किसी वर्ष आरक्षित वर्ग की सीटें खाली रह जाती हैं, तो उन्हें 'बैकलॉग' माना जाएगा और अगले वर्षों में भरने के दौरान उन पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत की अधिकतम आरक्षण सीमा लागू नहीं होगी। इसके तुरंत बाद उसी वर्ष 82वां संविधान संशोधन लाकर अनुच्छेद 335 में एक नया प्रावधान जोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक दक्षता का हवाला देते हुए पदोन्नति परीक्षाओं में न्यूनतम अर्हक अंक (पासिंग मार्क्स) घटाने पर रोक लगाई थी, लेकिन इस संशोधन के जरिए पदोन्नति की विभागीय परीक्षाओं और मूल्यांकन मानकों में एससी/एसटी अभ्यर्थियों के लिए कट-ऑफ घटाने की पूरी छूट दे दी गई। इस व्यवस्था ने उस विडंबना को जन्म दिया जहां 40 अंक लाने वाला व्यक्ति पदोन्नत होकर उच्च पद पर आसीन हो सकता है, जबकि सामान्य वर्ग का 75 अंक पाने वाला कर्मचारी उसी के अधीन कार्य करने को विवश रह जाता है।

रही-सही कसर वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2001 में 85वें संविधान संशोधन के जरिए पूरी कर दी। सर्वोच्च न्यायालय ने ‘अजीत सिंह’ और ‘वीरपाल सिंह चौहान’ मामलों में 'कैच-अप रूल' दिया था, जिसका अर्थ था कि यदि कोई सामान्य वर्ग का कर्मचारी अपनी योग्यता से बाद में प्रमोट होकर उसी पद पर पहुंचता है, तो वह पहले प्रमोट हुए आरक्षित वर्ग के जूनियर से अपनी वरिष्ठता वापस हासिल कर लेगा। वाजपेयी सरकार ने अनुच्छेद 16(4A) में संशोधन करते हुए ‘परिणामी वरिष्ठता’ (कॉन्सिक्वेंशियल सीनियोरिटी) का प्रावधान जोड़ दिया और इसे 1995 से भूतलक्षी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू कर दिया। इसका सीधा अर्थ यह निकला कि आरक्षण से मिला प्रमोशन अपने साथ स्थायी वरिष्ठता भी लाएगा और सामान्य वर्ग का वरिष्ठ साथी हमेशा के लिए जूनियर ही बना रह जाएगा। इस प्रकार, जिस व्यवस्था को सामाजिक विषमता पाटने का अस्थायी सेतु बताया गया था, वह दशकों की सियासी जोड़-तोड़ और संशोधनों के दम पर प्रशासनिक ढांचे की सबसे स्थायी और अकाट्य दीवार बन गई।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   
     
(लेखक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और समसामयिक विषयों पर लिखते हैं। हाईकोर्ट लखनऊ और इलाहाबाद में बतौर एडवोकेट प्रैक्टिस करते हैं।)