मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास की ओर से तन्मय धर की रिपोर्ट.
ग्वालियर । गीत, कविता, ग़ज़ल पर केन्द्रित एक अनूठी श्रृंखला जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास की ओर से फिर से आरम्भ की गयी है। दो कवियों के काव्य पाठ पर केन्द्रित "जी भर कर सुनिए" का कार्यक्रम वरिष्ठ साहित्यकार रामअवध विश्वकर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। शुरुआत में इस आयोजन की परिकल्पना न्यास की सचिव मान्यता सरोज ने रखी। उसके बाद दो अतिथि कवियों ने अपनी रचनाएं सुनाई।
वरिष्ठ कवि राम निहोर तिवारी (उमरिया)ने गीत और कविताओं में विरासत और वर्तमान दोनों को कलात्मकता के साथ बयान करते हुए कवि का आत्मपरिचय भी कविता में दिया और कबीर के अंदाज में कहा कि :
"हम हिन्दू हो सके न साधो मुस्लिम बने नहीं/
किसी जाति या किसी धरम की छतरी तने नहीं/
मठ मंदिर की किसी शिला के पूजे नहीं चरण/
जहां कहीं भी दिखा मुखौटा दिखलाया दरपन।"
करीब एक घंटे से अधिक के अपने काव्य पाठ में उन्होंने "ढूंढो अब नेवले का घर/ आ रहा बरसात का मौसम/ वामियों में भरेगा पानी/ सांप के उत्पात का है डर/ ढूंढ लो अब नेवले का घर" की सलाह भी दी। मौजूदा हालात की विडम्बना का जिक्र करते हुए उन्होंने मुक्तक सुनाया कि :
"फल सबके सब उनके हिस्से जिनके पेड़ न फलना जाने/
फलीभूत हो रहे आज जो पल में पाल बदलना जाने/
हम तो चले अहर्निश लेकिन अपनी रही यथावत दूरी/
मंजिल के मालिक बन बैठे जिनके पांव न चलना जाने।"
महेश कटारे सुगम (बीना) ने कविता की हरेक विधा में रची अपनी रचनाये सुनाई और कहा कि :
"जो मोहब्बत का पयम्बर हो गया/
एक कतरा था समंदर हो गया/
हौसलों की है यही जादूगरी/
इक सिपाही था सिकंदर हो गया।"
इसी के साथ उन्होंने "ऐसौ कैसौ राज कका जू खात चिरोया बाज कका जू" कविता के साथ उन्होंने :
"पथरा दिल मे प्यार कछू तौ गड़बड़ है/
जालिम करै जुहार कछू तौ गड़बड़ है।"
जैसी बुन्देली गजल और गीत भी सुनाये ।
समापन अध्यक्ष रामअवध विश्वकर्मा के गीत और ग़ज़ल से हुआ। उन्होंने आम जन की भाषा में उसकी मुश्किलों को स्वर देते हुए कहा कि :
"फीके रंग हुये जीवन के भूले सब सुर ताल ।
कितना बुरा जमाना आया जीना हुआ मुहाल।
चार गुनी कीमत में बिकती घुइंया और तुरइया।
नब्बे रुपए से भी ज्यादा गिरकर हुआ रुपइया।
आसमान में जा पहुँची है बड़े ठाठ से दाल।
कितना बुरा जमाना आया जीना हुआ मुहाल।
इस मौके पर साहित्य के रसिक और प्रशंसक पूरे समय मौजूद रहे और कवियों तथा कविताओं को मन भर कर सराहा। समारोह में दोनों अतिथि कवियों के साथ उमरिया से आये कवि, लेखक तथा साहित्य एक्टिविस्ट संतोष कुमार द्विवेदी का शाल एवं प्रतीक चिन्ह देकर स्वागत किया गया ।
अतिथियों ने सरोज जी - जिनका आज 24वां प्रस्थान दिवस भी था - के चित्र पर माल्यार्पण किया और सभी की ओर से उन्हें श्रद्धांजली अर्पित की। आभार प्रदर्शन तन्मय धर ने किया।
जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास ने एलान किया है कि वह गीत, ग़ज़ल, कविता की एक अलग ही तरह की महफ़िल लगाने का सिलसिला शुरू कर रहा है, जिसका मकसद सीमित कवि - असीमित रचनाएं - सुधी श्रोता - सुखद संध्या - वृक्षों की छांव और हरियाली दूब का प्राकृतिक परिवेश होगा। इसमें कविता की सभी विधाओं को शामिल किया जाएगा तथा यथासम्भव भाषा और बोलियों की भागीदारी सुनिश्चित कराने की कोशिश होगी।
जहां कहीं भी दिखा मुखौटा, दिखलाया दर्पण : श्रोताओं ने किया जी भरकर कविता श्रवण
सितंबर 20, 2026