मेरा बच्चा दिला दो... लंबे समय से भटक रही हूं। न तो बाल कल्याण समिति सुन रही है और न ही जिला प्रशासन। हर जगह गुहार लगा चुकी हूं। यदि बच्चा नहीं मिला तो मैं आत्महत्या कर लूंगी...। दरअसल एक मां डीएनए रिपोर्ट लिए अपने बच्चे को पाने के लिए भटक रही है। कलेक्टर ने मंगलवार को बाल कल्याण समिति को प्रकरण का निराकरण करने के आदेश दिए हैं।
वहीं, समिति न तो खुद निर्णय ले रही है और न ही जेजे एक्ट व कलेक्टर का आदेश मान रही है। इधर बच्चे को रेस्क्यू करने और उसे मां को सौंपने के मामले में समिति में मतभेद है। सदस्य कृपाशंकर और निवेदिता बच्चे को आरोपियों के ही घर में रखने के पक्ष में हैं जबकि एक अन्य सदस्य राजीव जैन उसे रेस्क्यू करके शिशु गृह भेजने की बात कह रहे हैं।
ढाई साल पहले ऐसे पहुंचा प्रीति और संजीव के पास नवजात : पीड़िता के मुताबिक वह गिरधारी नाम के व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहती थी। करीब ढाई साल पहले जब लड़का हुआ तो गिरधारी बच्चा किसी को देने के लिए दबाव बना रहा था। जब वह नहीं मानी तो वह शांत हो गया। उसके बाद उसके एक दोस्त राहुल ने घर आना-जाना शुरू किया। फिर राहुल के साथ संजीव और प्रीति आने लगे। प्रीति बच्चे के साथ काफी समय बिताने लगी। एक दिन वे बच्चे को अपने घर ले गए। उसके बाद से नहीं लौटे। जब उसने गिरधारी से बात की, तो उसने कहा कि उनके बच्चा नहीं है इसलिए वे तुम्हारे बच्चे से अपना सुख पूरा कर रहे हैं। दो दिन बाद गिरधारी से बच्चे के पास ले जाने की बात की तो उसने बताया कि बच्चा प्रीति और संजीव को क्राइस्ट चर्च के माध्यम से गोद दे दिया है। जब वह बच्चा लेने गई तो उन्होंने धक्का मारकर भगा दिया।
अवैध रूप से बच्चा रखने के मामले में हुई एफआईआर : एक बच्चे को अवैधानिक तरीके से रखने के मामले में पिपलानी थाने ने 24 जनवरी 2019 को कोलार निवासी प्रीति सिंह उसके पति संजीव सिंह, गिरधारी और राहुल के खिलाफ जेजे एक्ट की धारा 80 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। मां का आरोप है है कि प्रकरण दर्ज होने के 12 दिन बाद भी न तो पुलिस ने और न ही समिति ने बच्चे को रेस्क्यू करने के आदेश जारी किए।
यहां से उलझा मामला : महिला ने बच्चे की कस्टडी के लिए भोपाल कोर्ट में 19 दिसंबर 2016 को आवेदन दिया था। उस समय महिला के पास ऐसे कोई दस्तावेज नहीं थे जिससे वह मातृत्व सिद्ध कर सके। इसलिए कोर्ट ने आवेदन को खारिज कर उस समय व्यवस्था दी थी कि बच्चा मातृत्व सिद्ध होने तक दंपती के पास रहेगा। इसके बाद समिति ने बच्चे का डीएनए कराया। जिसके बाद यह सिद्ध हो गया कि बच्चा उसी महिला का है जिसने कस्टडी के लिए आवेदन दिया था। इसके बाद ये महिला बच्चा पाने के लिए भटक रही है।
मां को तुरंत दे देना चाहिए बच्चा
बाल कल्याण समिति द्वारा कराए गए डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट महिला के पक्ष में आई है। बच्चे के मामले में निर्णय लेने का अधिकार समिति को है। विवाद की गुजांइश ही नहीं है। डीएनए रिपोर्ट से महिला का मातृत्व सिद्ध होता है, तो बच्चा तुरंत जैविक मां को दे देना चाहिए। महेश सक्सेना, पूर्व अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति
महिला को बच्चा कोर्ट से लेना होगा। समिति इसे नहीं देगी और न ही रेस्क्यू करेगी। कृपा शंकर, सदस्य बाल कल्याण समिति
मेरा मानना है कि बच्चा आरोपियों के पास नहीं रहना चाहिए। मैं उसे रेस्क्यू करने के पक्ष में हूं। राजीव जैन, सदस्य बाल कल्याण समिति
