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लुभावने सपने दिखाने वाली कई कंपनियां धराशायी, बाजार मूल्य घटा


नई दिल्ली।  इंटरनेशनल मैग्जीन टाइम ने 2019 में कुछ क्षेत्रों में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण किया है। अमेरिका में कारोबार में चल रही महत्वपूर्ण हलचल पर नजर डाली है और कुछ प्रचलित शब्दों की व्याख्या की है। 2019 को अमेरिका में यूनिकॉर्न कंपनियों (वे टेक्नोलॉजी कंपनियों जिनका आईपीओ 1 अरब डॉलर से अधिक रहा।) का साल कहा जाता था, लेकिन वर्ष का अंत होने तक पिनट्रेस्ट को छोड़कर अधिकतर कंज्यूमर टेक कंपनियों के आईपीओ निवेशकों के लिए निराशाजनक साबित हुए हैं। ऐसा लगा कि यूनिकॉर्न मुनाफा नहीं कमाती हैं। भविष्य में भी उनके ऐसा करने की संभावना नहीं है।

कंज्यूमर टेक्नोलॉजी में सबसे अधिक आशा उबर और लिफ्ट से की जा रही थी। उनसे थोड़ा पीछे रियल एस्टेट कंपनी वीवर्क थी। वैसे, वह कभी वास्तविक टेक कंपनी नहीं रही। शेयर बाजार में आने के छह माह बाद उबर और लिफ्ट के शेयर मूल्य उसकी शुरुआती कीमत से एक तिहाई कम हो गए। वीवर्क ने अपना आईपीओ टाल दिया। उसके सीईओ के स्थान पर दो लोगों की नियुक्ति हुई है। वीवर्क के पूर्व सीईओ मंगल ग्रह पर बिल्डिंग बनाने या विश्व के अनाथ लोगों के लिए मकान बनाने के सपने दिखाते थे। कई लोगों की दलील है कि कंज्यूमर टेक्नोलॉजी कंपनियों के आईपीओ का हमेशा यही हाल हुआ है। गूगल, फेसबुक को भी स्टॉक मार्केट में उथल-पुथल झेलनी पड़ी है। वैसे, याद रखा जाए कि दोनों कंपनियां जब शेयर मार्केट में आई तो मुनाफा कमा रही थीं।
अब सफल आईपीओ की बड़ी लहर यूनिकॉर्न की नहीं होगी
गूगल, फेसबुक और अन्य कंपनियों की कामयाबी से भावी टेक कंपनियों को मुनाफे की तुलना में विशाल यूजर बेस बनाने का मंत्र मिला है। धारणा बनी कि यूजर मिलेंगे तो मुनाफा अपने आप आएगा। वाल स्ट्रीट ने पहले इस फिलॉसफी पर भरोसा कर लिया था। बाद में जाहिर हुआ कि शेयर बाजार मुनाफे पर विश्वास करता है। फिर भी, कंज्यूमर टेक की मृत्यु नहीं हुई है। उबर और लिफ्ट जैसी कंपनियां आती रहेंगी। पर अब सफल आईपीओ की बड़ी लहर यूनिकॉर्न की नहीं होगी।

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