- मोहंद्रा वन परिक्षेत्र में धनेश और हरियल: जैव विविधता की समृद्धि का संकेत
- पन्ना के वन क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है पक्षियों और वन्यप्राणियों की तादाद
- गिद्ध और बाघों के बाद अब विलुप्ति की कगार वाले पक्षियों की चहचहाट
पन्ना। दक्षिण पन्ना वनमण्डल के मोहंद्रा वन परिक्षेत्र में नियमित गश्त के दौरान भारतीय धूसर धनेश (Indian Grey Hornbill) एवं हरियल (Yellow-footed Green Pigeon) पक्षियों का अवलोकन किया गया। वनरक्षक जगदीश प्रसाद अहिरवार द्वारा इन पक्षियों के स्पष्ट चित्र मोबाइल कैमरे में कैद किए गए, जो क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

वन क्षेत्र को बढ़ाने वाला पक्षी माना जाता है धूसर धनेश को
भारतीय धूसर धनेश, जिसका वैज्ञानिक नाम Ocyceros birostris है, भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक मध्यम आकार का वृक्षवासी पक्षी है। इसका रंग प्रमुख रूप से धूसर (ग्रे) होता है, पेट हल्का सफेद-धूसर, लंबी पूंछ तथा बड़ी काली-पीली चोंच इसकी प्रमुख पहचान है। यह मुख्यतः बरगद, पीपल, पाकर एवं बेर जैसे वृक्षों के फलों पर निर्भर रहता है, हालांकि कभी-कभी छोटे कीट भी खाता है। धनेश को “वन निर्माता” (Forest Builder) भी कहा जाता है, क्योंकि यह बीजों को दूर-दूर तक फैलाकर वनों के पुनर्जनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी हरियल बढ़ा रहा है मध्यप्रदेश की शान
इसी प्रकार हरियल, जिसका वैज्ञानिक नाम Treron phoenicopterus है, एक आकर्षक हरे रंग का कबूतर प्रजाति का पक्षी है। यह प्रायः ऊँचे वृक्षों जैसे पीपल, बरगद एवं गूलर पर निवास करता है और अपने सामाजिक व्यवहार तथा मधुर सीटी जैसी ध्वनि के लिए जाना जाता है। यह मुख्यतः फलों एवं पुष्पों पर निर्भर रहता है और झुंड में रहना पसंद करता है। इसकी लंबाई लगभग 30 सेमी तथा वजन 225-260 ग्राम के बीच होता है। बुंदेलखंड क्षेत्र में इसे “हाडर” या “हाडेल” के नाम से भी जाना जाता है तथा यह महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी है।
कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग और प्रतिकूल मौसम बना जानलेवा
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा इन दोनों पक्षियों को “Least Concern” श्रेणी में रखा गया है, फिर भी वनों का अत्यधिक दोहन एवं कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग इनके आवास एवं प्रजनन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। मोहंद्रा वन परिक्षेत्र में इन पक्षियों की उपस्थिति न केवल क्षेत्र की स्वस्थ पारिस्थितिकी का संकेत है, बल्कि वन विभाग द्वारा किए जा रहे संरक्षण प्रयासों की सफलता को भी दर्शाती है।
किसानों और ग्रामीणों से संवाद करके सरंक्षण के लिए करते हैं जागरुक
टाइगर रिजर्व ऐरिया में तो कीटनाशकों की समस्या नहीं होती, लेकिन बफर जोन में जरुर किसान फसलों में कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। एसे में किसानो और गांववालों के साथ लगातार संवाद करके, चौपाल आदि में वन और वन्यप्राणियों के सरंक्षण के लिए जागरुक करते हैं। कोशिश रहती है कि कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग हो, ताकि पक्षियों के प्रजनन पर प्रभाव नहीं पडे।
-वीरेंद्र पटेल, डिप्टी डायरेक्टर, पन्ना टाइगर रिजर्व