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जेके लोन हॉस्पिटल: संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल; रैफर होकर आते हैं ज्यादातर


कोटा। शहर के जेके लोन अस्पताल में बीते 1 महीने में अब तक 106 बच्चों की मौत हो चुकी है। शुक्रवार को मंत्री रघु शर्मा के दौरे से पहले भी एक बच्ची ने दम तोड़ दिया। दैनिक भास्कर मोबाइल ऐप की टीम जब अस्पताल पहुंची तो कई चौंकाने वाली चीजें सामने आईं। दरअसल, कोटा का सबसे बड़ा अस्पताल जेके लोन है। इस वजह से आसपास के जिले, कस्बे और गांवों के लोग बड़ी संख्या में इलाज के लिए पहुंचते हैं। इमरजेंसी केस भी इसी अस्पताल में रैफर किए जाते हैं। 

जब यहां भर्ती लोगों के परिजन से बात की तो उन्होंने बताया कि अस्पताल में सफाई तो छोड़िए बिजली तक की व्यवस्था नहीं थी। मंत्री जी के आने से पहले ही लाइटें लगाई गईं। वरना जगह-जगह चूहें घूम रहे थे। खाने की व्यवस्था भी हमें खुद बाहर से करनी पड़ती है। अस्पताल के शिशु वार्ड समेत कई वार्डों में खिड़कियों से ठंडी हवा आती रहती है, जिसके कारण ठंड से मरीजों की हालत और खराब हो जाती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अस्पताल में कुछ दिनों पहले हिटर खरीदे गए थे। यह कहां गए, किसी को नहीं पता। अब भी मरीज सर्दी से ठिठुर रहे हैं।
मंत्री के जाने के बाद एक और बच्ची की मौत
मंत्री के दौरे के चंद मिनट बाद एक और बच्ची (टीना) की मौत हो गई। दोसा की रहने वाली इस बच्ची की उम्र 5 माह थी। उसकी मौत का कारण निमोनिया बताया गया। उसके पिता ने बताया कि जेके लोन अस्पताल में लाने से पहले उसे बूंदी के हॉस्पिटल लेकर आए थे मगर हालत बिगड़ने पर कोटा लेकर आए।

हालांकि, बच्चों की मौत का मामला सामने आने के बाद अस्पताल द्वारा कुछ और नए हीटर खरीदे गए। ऑक्सीजन पाइपलाइन का काम भी शुरू कर दिया गया। देर रात अस्पताल में रंगाई-पुताई शुरू कर दी गई। फिलहाल अस्पताल में 10 वेंटिलेटर काम कर रहे हैं जबकि शेष 5 सही होने की स्थिति में नहीं हैं। 
दूसरे सरकारी अस्पतालों में बच्चों के लिए पलंग नहीं
जिले के बाकी अस्पतालों के हालात भी काफी खराब हैं। कोटा के मेडिकल कॉलेज में गायनिक का 1 विभाग है। वहां 65 पलंग हैं। यह हमेशा फुल रहता है। ठंड के मौसम में भी जच्चा-बच्चा को नीचे सुलाना पड़ता है। यहां 100 पलंग की जरूरत है। शहर के अन्य सीएचसी-सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में कहीं शिशु रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं तो किसी में सुविधाएं पूरी नहीं हैं। 
क्यों हो रही बच्चों की मौत
अधिकारियों के मुताबिक, बच्चों की मौत की संख्या इसलिए कम नहीं हो रही क्योंकि ये संभाग स्तर का अस्पताल है। यहां कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ से मरीज आते हैं। यह बहुत पुराना है। इसके साथ मध्यप्रदेश की बॉर्डर से जुड़े 4-5 जिले भी हैं। यहां भी किसी मरीज के सीरियस हो जाने पर उसे जेके लोन ही भेजा जाता है। जब बच्चा 3 से 4 घंटे ट्रैवल होकर अस्पताल पहुंचता है तो और ज्यादा सीरियस हो जाता है। यहां ज्यादातर बच्चे ग्रामीण इलाकों से लाए जाते हैं। कारण, वहां पुराने तरीके से प्रसव करवाया जाता है, नतीजतन केस बिगड़ जाता है। इसके बाद लोग 100-150 किमी सफर करने के बाद अस्पताल पहुंचते हैं।
ड्रिप लगाकर चाय पीने चले जाते थे कर्मचारी
मृतक बच्चे की मां ने बताया कि कर्मचारी ड्रिप लगाकर चाय पीने चले जाते थे। वहां बैठकर हंसी-मजाक करते रहे थे। अगर हम कुछ कहते थे तो भी हम पर ही चिल्लाते थे कि आ रहे हैं अभी, मर नहीं रहा तुम्हारा बच्चा। परिजन ने बताया कि प्रसव करवाने के लिए स्टाफ भी पूरा नहीं है। एक महिला को बाथरूम में ही डिलीवरी हो गई, इसके बाद स्टाफ वहां पहुंचा।

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