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लोगो की लापरवाही से कुएं बने कचरा घर


                                               प्राचीन कुआ जिसे लोगो ने बनाया कचरा घर

बेगमगंज। नगर की ऐतेहासिक विरासत बावडियां, चैपड़ा, कुएं बदहाल हो रहे है। इन जल स्त्रोतों की सुध लेने वाला कोई नहीं है वहीं तीन साल पहले प्रशासनिक अधिकारियों ने मिली भगत से नगर के ऐतेहासिक चैपड़े को पुरवा कर उसका असतित्व समाप्त कर दिया। तो वहीं प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के कारण करीब आधा दर्जन कुए पूरकर उन पर अतिक्रमण कर लिया गया।

नगर की अमूल्य धरोहरें बदहाल है इन्हें कोई दखने वाला और सुध लेने वाला नहीं। ये है बेशकीमती बावडिया, कुएं जो नवाबकालीन है। इन्होने अब तक हमें सिर्फ दिया ही दिया है अभी ये मौन है  लेकिन समय की दरकार है कि हम अपनी संवेदनाओं को समेंटें, चिंता की लकीरें उस शरीर पर लाएं जिसे इन बावडियों कुओं ने सींचा है।

नगर में इस समय दो बावडियां जिंदा है जिसमें एक झुरैया मंदिर बावड़ी का पानी पीने के काम भी लिया जाता है तो दूसरी चोर बावड़ी का पानी खर्चे के काम में लिया जाता है। वहीं करीब 9 कुएं जिंदा है जिनमें कंजी कुआ, जज जी का कुआं,गांधीबाजार, पीराशाह मोहल्ला, काजी मो., पक्का फाटक, दशहरा मैदान, ं हनुमान बाग एवं गंभीरिया मंदिर का कुआं शामिल हैं। हालांकि आज से पचास साल पहले इनकी संख्या कहीं ज्यादा थी हालांकि  15 वर्ष पूर्व भी अधिक थी । इनकी क्षमता इतनी थी कि न केवल उस दौर की पूरी आबादी का गला तर करतीं थी बल्कि बाग बगीचों को भी इनसे ही सींचा जाता था। लेकिन अब ये बदहाल है और धीरे धीरे इनका अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है।

नवाबी हुकूूमत में बेगम ने अपनी और आम जनता के पेयजल प्रबंधन हेतु कई सदाबहार सदानीरा कुओं और बावडियों चैपड़े आदि का निमार्ण करवाया। इन कुओं और बावडियों को इस खूबसूरती से बनवाया जाता था कि इनका उपयोग केवल पानी के लिए ही नहीं गर्मिेयों के दिनों में पीने व नहाने के लिए भी किया जा सके। आमतौर पर सभी बावडियों की स्थापत्य कला मुगलकालीन शैली से प्रभावित दिखाई देती है। मेहराबों और स्तभों पर की गई नक्काशी अतिआकर्षक है।

ऐतेहासिक बावडियां - कुएं:- वार्ड 10 मेे स्थित सबसे पुरानी चोर बावड़ी, प्रसिद्ध झुरैया मंदिर की बावड़ी, गंभीरिया मोहल्ले में स्थिती चैपड़ा जिसका अब असतित्व समाप्त कर दिया गया जिसकी अब यादे ही बाकी है। पीराशाह मोहल्ले से लगा मुगलकालीन कला से ओत प्रोत तिन्स कुआं एवं छतरी और बगीचा, किला अंदर खूबसूरत कुआं, गढोईपुर में स्थित कुआं, लोहा मील का कुआ व टंकी, हाई स्कूल में स्थित जज जी का कुआ, बजरिया मंदिर के सामने वाला कुआ, काजी मोहल्ले का कुआ, खिरका मंदिर का कुआ, गांधी बाजार का कुआ, वार्ड 9 में स्थित कुआ, हनुमान मंदिर का कुआ, पुरानी अस्पताल एवं वर्तमान अस्पताल का कुआ, हनुमान बाग का कुआ, ब्लाक का कुआ, हदाईपुर वाला कुआ, गंभीरिया स्थित मंदिर वाला कुआ, फार्म का कुआ, जिनका पानी कभी समाप्त नहीं होता था लेकिन आज अपनी दुर्दशा और बदहाली पर आंसू बहा रहे है लोगों की उपेक्षा के साथ साथ प्रशासन की भी उपेक्षा रही जो इन कुओं एवं बावडियों का रख रखाव नहीं कराया गया यही कारण है कि अधिकांश का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है।
प्राचीन कुए चैपड़ा जो अपना अस्तित्व खो चुके है-
किले के अंदर का कुआ, पुरानी अस्पताल का कुआ, ब्लाक का कुआ, सागर रोड पर गढ़ोईपुर स्कूल के सामने वाला कुआ, गल्र्स स्कूल के पीछे वाला कुआ, अस्पताल परिसर का कुआ, मंलग शाह का कुआ, मकबरे में जागीरदार का कुआ। एवं गंभीरिया मोहल्ले में चोपड़ा।
ऐसे कुए बावड़ी जिनको तनिक संवार दिया जाए तों लाभ मिलने लगेः-
चोर बावड़ी, तिनसकुआं, लोहा मील का कुआ, फकीरा पुरा का कुआ,  लोहा मील का कुआ, किला अंदर का कुआ, कंजी कुआ, जज जी का कुआ, झुरैया मंदिर के पास की बावड़ी, आदि को सहेज संवार दिया जाए तो लोगों का लाभ मिल सकता है।
शहर की बेसिक जियोग्राफी हैं ये-
वरिष्ठ अधिवक्ता हाजी चांद मियां, रिटायर्ड प्राचार्य विद्यानंद शर्मा का कहना है कि असल में किसी भी शहर की एक बेसिक जियोग्राफी होती है अगर यह कहा जाए कि उस शहर की पहचान भी होती है तो कुछ गलत नहीं होगा। अगर प्लान करने वाले इस गुण को देखकर योजनाए बनाएं तो बेहतर होगा। इससे ऐतेहासिक महत्व की धरोहरें सुरक्षित होगंी वही शहर का विकास भी समग्र तरीके से हो सकेगा। कुएं बावडियों को एक विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। चोर बावड़ी, चोपड़ा तिन्स कुआ, जज जी का कुआ आदि एक जमाने में ऐसे थे कि लोग अपना गला तर तो करते ही थे सिंचाई भी किया करते थे लोग नहाने भी यहां पर आते थे। लेकिन आज वे अपना अस्तित्व खो चुके है।
शुद्ध जल उपलब्ध कराने बावडियां ही करेगीं उद्धार-
सेवा निवृत्त पटवारी मंशाराम पंथी, सेवानिवृत्त शिक्षक एवं कर्मचारी नेता उदयराम यादव का कहना है कि रियासत काल में राजा महाराजा नवाब के परिजनो के अलावा जनता भी इनका पानी उपयोग करती थी। इनके निमार्ण में शिल्प कला के साथ जो तकनीक इस्तेमाल की गई है उसी का कमाल है कि आज भी इनमें पानी उपलब्ध है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि इनका संरक्षण कर इनका शुद्ध जल पीने के लिए उपलब्ध कराने में अहम किरदार अदा करे। सालों से जिन का पानी उपयोग नहीं किया जा रहा है और लोगो द्वारा  गंदगी कचरा डालने से उनका पानी प्रदूषित हो चुका है उनको साफ करवाना चाहिए और बंद झिरों को होरीजोंटल बोरिंग से खुलवाना चाहिए। और पाइप लाइन के जरिए पानी सप्लाई करवाना चाहिए।
ग्राउंड वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब नमूना-
कृषक एवं समाज सेवी शिवनारायण नीखरा, पन्नालाल गुप्ता का कहना है कि प्राचीन काल में कुएं और बावडियां ही पेयजल स्त्रोत का एक मात्र साधन थी एक समय ऐसा भी आया जब लोगों ने इन्हें भुला दिया। आज जब लोगो को पीने के लिए शुद्ध जल चाहिए जिन्हंे सहेजने और व्यर्थ पानी न बहाकर नलों में
टोटियां लगाकर पानी को संरक्षित करने की ढोड़ी नपा द्वारा पिटवाई जा रही है तो यह अच्छा है इनको फिर से रिवाइज करके उपयोग किया जा सकता है।  वैसे नगर पालिका की जलावर्धन योजना से नगर मंे पानी ही पानी है लेकिन कुछ लोग पीने के लिए टेंकरों से पानी खरीदते है। बावडियां कुएं ग्राउंड वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब नमूना है। इसके साथ ग्राउंड वाटर रिचार्जिंग भी होती है।

सीएमओ बीएल सिंह  का कहना है कि प्राचीन जल स्त्रोतों के संरक्षण के प्रयास पिछले वर्षों में किए गए है जिनमें चोर बावड़ी की बाउंड्री बनवाई गई एवं काजी मोहल्ले के कुए पर छत करवाई गई है पक्का फाटक के कुएं का भी संरक्षण किया गया इसके अलावा अन्य का संरक्षण भी किया जाएगा जनता को भी इसमें आगे आना होगा कि वे इनमें कचरा एवं गंदगी डाल कर इनके अस्तित्व को समाप्त न करें। वैसे नगर में जल की कमी नहीं है जलावर्धन योजना ने नगर में पानी ही पानी कर दिया है।