बेगमगंज। ग्राम टेकापार खुर्द में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण के तृतीय दिवस में पं.कमलेश शास्त्री ने कथा श्रवण कराते हुए कहा कि कलयुग में वह व्यक्ति महान है, जिसे भगवान की कथा सुनने का अवसर मिलता है। भक्त और भगवान के बीच गहरा सम्बन्ध है। जीवन में जैसा करते हैं, वैसा फल प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता है। मनुष्य को पुण्य कर्म का नाम जपने से ही मुक्ति मिलती है। उन्होंने प्रभु नाम की महिमा का भी वर्णन करते हुए कहा कि अजामिल ने अपने जीवन में बुरे कर्म किए, लेकिन सन्तों के कहने पर अपने पुत्र का नाम "नारायण" रख लिया। अंत समय में नारायण- नारायण पुकारने पर उसे मोक्ष प्राप्त हुआ। मनुष्य जिस कामना व भावना को लेकर प्राणों का त्याग करता है, अगला जन्म उसी के अनुसार होता है। उन्होंने कहा कि वृद्धावस्था में भी प्रभु के प्रति श्रद्धा का भाव प्रकट हो जाए तो जीवन सफल हो जाता है। भागवत भजन करने से मनुष्य का जीवन बदल जाता है। आज हम पश्चिम का अनादर नहीं करते, परन्तु उनमें अर्पण, तर्पण व समर्पण की कोई परम्परा नहीं है। भारत भूमि में वैराग्य, धर्म, संवेदनाओं से भरी पड़ी है। पश्चिमी देशों के लोग इसे समझ नहीं सकते। शास्त्री ने कहा कि निराशा ही मृत्यु है और आशा ही जीवन है। निराश व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों को भी अनिच्छा तथा हीनता की भावना से देखते हैं, फलस्वरूप उनके जीवन में किसी तरह की सुन्दरता का, सम्पन्नता का उदय नहीं हो पाता। उनके आश्रित और सहारे में पल रहे स्वजन परिजन भी अविकसित रह जाते हैं, इसलिए उत्साह हीनता को एक तरह का अपराध ही कहा जाएगा। उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य के भीतर ललक के साथ उत्साह आवश्यक है। कोई व्यक्ति अपने कार्यों में सफल तब हो सकता है, जब नए कार्यों को करने की निर्माणात्मक उमंग भरी हो। उत्साह और आशा से ही बड़े कार्य सम्पन्न होते हैं। महान कार्य करने के लिए मन की स्थिति भी महान होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि विश्वास जीवन है, जो टूटे वह श्वास है और जो कभी ना टूटे वह विश्वास है। शंका करने वाला शीघ्र आहत हो जाता है। वह टिक नहीं सकता। वह हारने का काम कर रहा है, जीतने का नहीं। अपने परिवार पर भरोसा करें। पत्नी-बच्चों पर भरोसा करें। मित्र सम्बन्धियों पर परमात्मा पर विश्वास करो तो ही जी पाओगे, श्रीहनुमानजी को परमात्म-विश्वास है। जो परमात्मा में विश्वास रखता है, वही सीता यानी 'भक्ति' की खोज कर पाता है ।
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श्रीमद् भागवत कथा |
कथा के अंत में मुख्य यजमान हरिनारायण यादव एवं समस्त ग्रामवासियों ने व्यास पीठ की आरती उतारी और प्रसाद वितरण किया।

