शरद का समाजवाद ‘जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी’
भोपाल। आजीवन समाजवादी रहे वरिष्ठ नेता शरद यादव के निधन के बाद उनकी अस्थियां नदियों में नहीं बहाई गईं। उनकी इच्छा के अनुसार अस्थियों के दो कलश बनाए गए। एक अस्थि कलश जन्मभूमि नर्मदापुरम जिले के आंखमऊ गांव की मिट्टी में दबा दिया गया तो दूसरा कर्मभूमि मधेपुरा बिहार की जमीन में गाड़ा किया जाएगा। दरअसल, शरद यादव चाहते थे कि उनके निधन के बाद कोई गैरजरूरी औपचारिकताएं नहीं की जाएं। इसी के चलते परिवार ने मृत्युभोज नहीं कराने का फैसला किया है। शरद यादव आजीवन तो समाजवादी रहे ही मरणोपरांत भी समाज को कुरीतियां मिटाने का संदेश दिया।
शरद यादव की बेटी सुभाषिनी ने सोशल मीडिया के माध्यम से बताया कि उनके पिता ताउम्र प्रकृति के बेहद करीब रहे और उन्हें नदियों, पेड़-पौधों और पशुओं के साथ-साथ अपने जन्मभूमि और कर्मभूमि से बेहद लगाव था। उनकी हमेशा से एक इच्छा रही थी कि जब भी उनका देहावसान हो तो उनकी अस्थियों को नदी में बहाने की बजाए उनकी जन्मभूमि बाबई (आंखमऊ) और कर्मभूमि मधेपुरा में जमीन के अंदर दबा दिया जाए। उनका मानना था कि अस्थियों को नदी में बहाने से वह दूषित होती हैं और यह प्रकृति के खिलाफ है। उनकी भावनाओं के अनुरूप हमने उनकी अस्थियों को दो कलश के अंदर संग्रह किया है। एक कलश उनके पैतृक गांव में जहां उनका दाहसंस्कार हुआ है वहां स्थापित कर दिया और दूसरे कलश को उनकी कर्मभूमि मधेपुरा पटना से सड़क मार्ग द्वारा मंडल मसीहा के समर्थकों के अंतिम दर्शन हेतु लेकर जाया जाएगा इसके बाद मधेपुरा में कलश को जमीन के अंदर स्थापित किया जाएगा सुभाषिनी ने बताया कि इसकी सूचना जल्दी ही मधेपुरावासियों को दे दी जाएगी।
मरणोपरांत भोज समाज में खाई बढ़ाता है
सुभाषिनी ने बताया कि पिताजी मरणोपरांत भोज कार्यक्रम के खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे समाज में खाई बढ़ती है। जो सक्षम हैं उनके द्वारा भोज के आयोजन से गरीबों को भी इस प्रथा का अनुसरण करना पड़ता है। गरीब सक्षम नहीं होते और उन पर कर्ज तथा आर्थिक दबाव बढ़ता इसलिए भोज प्रथा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। पिताजी के इस महान विचार को आगे बढ़ाते हुए हमने उनका भोज कार्यक्रम नहीं रखने का निर्णय लिया है। इसके बदले दिल्ली में एक शोक बैठक का आयोजन किया जाएगा। यादव का परिवार मंगलवार से दिल्ली के छतरपुर स्थित निवास पर रहेगा जहां शोक बैठक आयोजित की जाएगी।

