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नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा- समान नागरिक संहिता के नाम पर आदिवासी अस्मिता से समझौता स्वीकार नहीं

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह कानून आदिवासी समाज की पहचान, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।


उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं का देश है, जहां आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ सदियों से जीवन यापन कर रहा है। ऐसे में एकरूप कानून थोपना न केवल उनकी परंपराओं का अनादर है, बल्कि यह उनके अधिकारों का भी उल्लंघन है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 में यूसीसी को ‘राज्य के नीति निदेशक तत्व’ में रखा गया था, क्योंकि संविधान सभा यह समझती थी कि विविधताओं वाले देश में इस विषय पर व्यापक सहमति बनानी होगी। यह कोई तत्काल लागू होने वाला अनिवार्य अधिकार नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक सिद्धांत था। लेकिन बीजेपी सरकार इसे जल्दबाजी, बिना संवाद और बिना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के थोपने का प्रयास रही है।

सिंघार ने कहा, यूसीसी के नाम पर जो एकरूपता थोपी जा रही है, वह ‘विविधता में एकता’ के हमारे मूल मंत्र को तोड़ती है। आदिवासी समाज की अपनी सामाजिक व्यवस्था, विवाह, उत्तराधिकार और भूमि से जुड़े रीति-रिवाज सदियों पुराने हैं। पांचवीं और छठी अनुसूची उन्हें सांस्कृतिक स्वायत्तता देती है। यदि यूसीसी बिना छूट के लागू हुई, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ होगा।

सिंघार ने सरकार के ‘समानता’ के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि समानता का अर्थ एकरूपता नहीं होता, बल्कि हर समुदाय की विशिष्टता को सम्मान देते हुए न्याय सुनिश्चित करना होता है। उन्होंने चिंता जताई कि न तो आदिवासी संगठनों, न पंचायतों, न ही किसी धार्मिक या सामाजिक समूह से चर्चा की गई।

बीजेपी की यही ‘नया सामान्य’ बन गया है – बिना विचार-विमर्श के कानून बनाना। यह अलोकतांत्रिक, असांप्रदायिक और असंवैधानिक है। सरकार को साफ जवाब देना चाहिए कि क्या यूसीसी आदिवासियों पर लागू होगी? यदि नहीं, तो संरक्षण की गारंटी क्यों नहीं दी जा रही? यह अनिश्चितता जानबूझकर फैलाया गया भय है।”

सिंघार ने सरकार से स्पष्ट जवाब मांगते हुए कहा कि क्या आदिवासी समुदायों को यूसीसी के दायरे में लाया जाएगा या उन्हें इससे बाहर रखा जाएगा। साथ ही उन्होंने मांग की कि आदिवासी समाज को इस संहिता से बाहर रखा जाए और उनकी परंपराओं व अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

सिंघार ने कहा कि बिना सहमति और संवाद के लाया गया कानून समाज में बंटवारे का काम करेगा। “यूसीसी की घोषणा ने एकता की बजाय अलगाव पैदा किया है। सरकार तुष्टीकरण की राजनीति छोड़े, आदिवासी समाज को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाए और सभी समुदायों को विश्वास में लेते हुए कोई साझा मसौदा तैयार किया जाए। जल्दबाजी और अलोकतांत्रिक तरीका बीजेपी की असहिष्णु सोच को दर्शाता है।

उन्होंने सरकार से अपील की कि इस मुद्दे पर विधानसभा में विस्तृत चर्चा हो, सभी धर्मों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों को साथ लेकर ही कोई नीति बने, अन्यथा यह देश की सांस्कृतिक विविधता के लिए घातक साबित होगी।

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