ज्ञान मार्ग पर चलना कलयुग में बहुत मुश्किल है क्योंकि उसमें अधिकारी होना चाहिए। संसार से पूर्ण विरक्त व्यक्ति ही ज्ञान मार्ग में अधिकारी बनेगा और दूसरी बात ज्ञानी भगवान् की शरण में नही जाता है और नियम ये है कि सगुण साकार भगवान् के शरणागत होने पर ही मायानिवृति हो सकती है। ज्ञानी का ज्ञान मार्ग में बार बार पतन होता है जिसकी रक्षा करने वाला न भगवान् होता है न गुरु ही होता है और जो भक्त है भक्ती मार्ग में वो भगवान् तथा गुरु के शरणागत रहता है, आश्रित रहता है इसलिए भगवान् उसकी रक्षा करते है। भक्त की रक्षा करते है भगवान्, किंतु ज्ञानी की रक्षा नहीं करते। ज्ञानी की रक्षा तब करेगें जब ज्ञानी भगवान् की शरण में जायेगा। जब ज्ञानी भगवान् के शरण में जायेगा तभी उसको ब्रह्मज्ञान अथवा मोक्ष हो सकता है।ज्ञानी भगवान् के शरण में जायेगा तभी उसको ब्रह्मज्ञान अथवा मोक्ष हो सकता है। उसी प्रकार योगी को भी अपने स्वरुप का ही ज्ञान रहता है ज्ञानी सब कुछ ब्रह्म कहते है और जीव को भी ब्रह्म बताते हैं।
असल में जीव को शास्त्रों में इसलिए ब्रह्म बताया गया क्योंकि भगवान सबके अंदर बैठे हैं, सबके अंदर ब्रह्म व्याप्त हैं न कि जीव ही ब्रह्म है वरना जीव में इतनी सारी कमियाॅ है और ब्रह्म सर्वसमथ सर्वगुण सम्पन्न है। बहुत अंतर है। माया भगवान् की शक्ति होने के कारण बिना उनकी कृपा के नही जा सकती। जब तक माया नही जायेगी तब तक भगवद्प्राप्ति नही होगी इसलिए भगवान् की शरणागति करना एवं साधना करना आवश्यक है।
असल में जीव को शास्त्रों में इसलिए ब्रह्म बताया गया क्योंकि भगवान सबके अंदर बैठे हैं, सबके अंदर ब्रह्म व्याप्त हैं न कि जीव ही ब्रह्म है वरना जीव में इतनी सारी कमियाॅ है और ब्रह्म सर्वसमथ सर्वगुण सम्पन्न है। बहुत अंतर है। माया भगवान् की शक्ति होने के कारण बिना उनकी कृपा के नही जा सकती। जब तक माया नही जायेगी तब तक भगवद्प्राप्ति नही होगी इसलिए भगवान् की शरणागति करना एवं साधना करना आवश्यक है।
ज्ञानमार्गी से भक्तिमार्गी श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानमार्गी का पतन हो जाता है क्योंकि ज्ञानी को अपने ज्ञान का मिथ्या अभिमान होता है बल्कि भक्त अपने आप को दीन हीन, पतित मानता है तो उस पर दीनानाथ भगवान की कृपा जल्दी हो जाती है। ज्ञानी अपने बल पर चलता है जबकि भक्त भगवान के बल पर आश्रित होता है। इसलिए भक्त का पतन नहीं होता क्योंकि वहाँ पर गुरु उसका योगक्षेम वहन करते हंै। भगवान् ने गीता में कहा है कि ‘मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते’ अर्थात् भगवान् के पूर्ण शरणागत होने पर ही माया से पार हो सकते हैं। बडे़ बड़े सुकदेवमुनि जो भागवत के रचयिता हुए हैं वो पहले ज्ञानी थे परंतु फिर श्रीकृष्ण की भक्ति करके श्रीकृष्ण का प्रेम प्राप्त किया। भक्ति मार्ग में भगवान श्री कृष्ण का प्रेमानंद या ब्रजरस मिलता है, जिसकी महिमा सभी संतों ने बताई है, वृंदावन में उद्धवजी ब्रजरस में ब्रज के प्रेम में पागल हो गये और गोपियों को गुरु बना लिया था तथा ज्ञान मार्ग को छोड़कर भक्ति मार्ग में आ गये, जनकजी जो ब्रह्मलीन थे भगवान राम को देखकर सगुण ब्रह्म की भक्ति करने लगे। इस प्रकार ज्ञान मार्ग को बहुत कठिन और भक्ति मार्ग को अत्यंत सरल बताया गया है। 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के अंतिम दिन कल 12 मई को शाम 7 बजे से भक्ति मार्ग पर प्रकाश डाला जावेगा। प्रवचन के पश्चात् श्री गुरुदेव चरण पादुका पूजन के पश्चात् महाआरती का आयोजन होगा।

