25 अगस्त, 2026 को 71 साल की उम्र में कॉमरेड सोन्या गिल का आकस्मिक निधन मुंबई और महाराष्ट्र में महिला आंदोलन और वामपंथी आंदोलन के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। यह उन सभी लोगों के लिए एक बड़ा झटका है, जो उन्हें एक कॉमरेड और दोस्त के तौर पर प्यार और सम्मान देते थे।
सोन्या गिल लंबे समय तक सीपीआई(एम) की महाराष्ट्र राज्य समिति और मुंबई ज़िला सचिवमंडल की सदस्य रहीं। वह लगभग दो दशकों तक अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की केंद्रीय कार्यकारिणी समिति की सदस्य रहीं और 2010 से 2019 तक तीन बार जनवादी महिला समिति की महाराष्ट्र राज्य महासचिव और बाद में राज्य उपाध्यक्ष भी रहीं। अपने पति और मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ के साथ मिलकर, वह 'पीपुल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया' (परी) की सह-संस्थापक और ट्रस्टी थीं।
सोन्या एक पंजाबी सिख परिवार से थीं। उनके पिता सेना में अफसर थे और माँ गृहिणी थीं। सोन्या का जन्म 27 सितंबर, 1955 को हुआ था और उन्होंने दिल्ली के मेटर डेई स्कूल से पढ़ाई की, जहाँ वे पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छी थीं और उन्हें 'बेस्ट ऑल-राउंडर' भी चुना गया था। उन्होंने पुणे के एस.पी. कॉलेज से स्नातक किया। 1976 से 1980 तक, उन्होंने दिल्ली के जेएनयू से समाज विज्ञान में एमए और एमफिल किया। दोनों में उन्हें 'ए' ग्रेड मिला। जेएनयू में ही वे वामपंथी विचारधारा के संपर्क में आईं। इसके बाद, 1981-82 में उन्होंने एक साल तक मुंबई के सोफिया कॉलेज में समाज विज्ञान का अध्यापन किया और फिर 'फ़ाउंडेशन फ़ॉर रिसर्च इन कम्युनिटी हेल्थ' (एफआरसीएच) में काम किया। स्वास्थ्य हमेशा से उनकी दिलचस्पी और पढ़ाई का एक अहम विषय रहा।
सोन्या 1989 में जनवादी महिला समिति से जुड़ीं और महिला आंदोलन में सक्रिय हो गईं। उन्होंने अहिल्या रांगणेकर और प्रभा सावंत की देखरेख में मध्य मुंबई के कामकाजी इलाकों -- जैसे वर्ली बीडीडी चॉल, जीजामाता नगर और डेलिसल रोड -- में महिलाओं के बीच काम करना शुरू किया। 1994 में उन्हें जनवादी महिला समिति की मुंबई ज़िला समिति का अध्यक्ष चुना गया। इस पद पर रहते हुए, उन्होंने पूरे शहर में महिला समिति की स्थानीय इकाइयाँ बनाने पर बहुत ध्यान दिया। उन्होंने मुंबई में अन्य धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील महिला संगठनों के साथ मिलकर काम करने के लिए भी विशेष प्रयास किए। वह आखिर तक मुंबई में महिला समिति की एक मज़बूत स्तंभ बनी रहीं।
बाद में उन्हें जनवादी महिला समिति की महाराष्ट्र राज्य समिति और फिर इसके राज्य सचिवमंडल के लिए चुना गया, और 2010 में वे राज्य महासचिव बनीं। उन्होंने 2019 तक तीन कार्यकाल के लिए यह ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। उन्होंने कई ज़िलों का दौरा किया और संगठन को मज़बूत बनाने में मदद की। उन्हें 2007 से 2023 तक जमस की केंद्रीय कार्यकारिणी समिति (सीईसी) के लिए चुना गया। प्रजनन, स्वास्थ्य, जनसंख्या नीति और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य मुद्दों पर चर्चा में उनका योगदान बहुत अहम था। इससे जमस को राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर अपना रुख तय करने में मदद मिली। सोन्या ने जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) में जमस का प्रतिनिधित्व किया और इसके अभियानों में लिंग से जुड़े नज़रिए को शामिल करने में अहम भूमिका निभाई।
सोन्या 1990 में सीपीआई(एम) में शामिल हुईं ; 1997 में सीपीआई(एम) की मुंबई ज़िला समिति, 2005 में ज़िला सचिवमंडल और 2012 में महाराष्ट्र राज्य समिति के लिए चुनी गईं।
सोन्या ने 29 मार्च, 1986 को पी. साईनाथ से शादी की। वे जेएनयू में पढ़ाई के दौरान मिले थे। उनकी चार दशकों की बेहद मज़बूत निजी और राजनीतिक साझेदारी 25 अगस्त की शाम को अचानक खत्म हो गई, जब सैर के दौरान सोन्या अचानक गिर पड़ीं। हमने साईनाथ को कभी इतना टूटा हुआ नहीं देखा, जितना सोन्या के अंतिम संस्कार के समय देखा। 'परी' में उनका योगदान बहुत बड़ा था, और उस पर अलग से बात की जानी चाहिए।
सोन्या ने पिछले कुछ सालों में अपनी गंभीर बीमारी का बहुत हिम्मत के साथ सामना किया। उस दौरान उन्होंने और साईनाथ ने जो कुछ सहा, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन इन सबके बावजूद, उनका संकल्प, उनका शालीन व्यवहार और उनकी चमकती मुस्कान कभी कम नहीं हुई। उन्होंने कभी भी अपने दर्द या मुश्किलों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। पी. साईनाथ कहते हैं, "घर पर भी ऐसा ही था। 40 सालों में, मैंने उन्हें कभी भी अपनी सेहत या दर्द के बारे में शिकायत करते या अपनी परेशानी बताते हुए नहीं सुना। वह हर बार बहुत सकारात्मक रहती थीं - बड़ी सर्जरी के बाद भी, वह काम पर लौट आती थीं, पहले ऑनलाइन और फिर ऑफिस में।" वह आखिर तक जमस और सीपीआई(एम) की गतिविधियों में शामिल रहीं, यहाँ तक कि 10 अगस्त, 2026 को मुंबई में हुए देशव्यापी 'जेल भरो' आंदोलन में भी। यह सब उनकी बहुत ऊँचे दर्जे की हिम्मत और मज़बूती को दिखाता है।
मैंने और सोन्या ने 1994 से जमस में 32 साल तक एक साथ काम किया। एसएफआई के बाद मैं महिला आंदोलन से जुड़ी। हमने हर स्तर पर मिलकर काम किया और एक कार्यकाल के लिए महाराष्ट्र जमस की अध्यक्ष और महासचिव के रूप में भी एक साथ काम किया। उनके साथ काम करना बहुत सुखद था। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस का सामना करते हुए उनकी हिम्मत देखना प्रेरणादायक था। अखिल भारतीय रैलियों के लिए सैकड़ों महिलाओं के साथ मुंबई से दिल्ली तक बिना टिकट यात्रा करना बहुत रोमांचक था। ट्रेन में गाने, नारे और हंसी-मज़ाक गूंजते रहते थे। सोन्या ट्रेन में मौजूद महिलाओं के समूह में आसानी से घुल-मिल जाती थीं और एक सामूहिक शक्ति का हिस्सा बन जाती थीं।
असाधारण साथी
सोन्या सही मायनों में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली एक कार्यकर्ता थीं। उनकी राजनीति आम लोगों, खासकर मज़दूर वर्ग की महिलाओं के जीवन और संघर्षों से जुड़ी थी। उन्होंने महिलाओं के स्थानीय मुद्दों को पूरी लगन से उठाया, संघर्षों को संगठित किया और उन्हें कार्रवाई के लिए एकजुट किया। इससे महिलाओं को अपनी ताकत का एहसास हुआ और वे मुंबई की अलग-अलग बस्तियों में अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में सक्षम हुईं। दशकों तक, उन्होंने समानता, सम्मान और न्याय के लिए महिलाओं के सामूहिक संघर्षों को मज़बूत करने में खुद को समर्पित किया।
सोनिया ने महिला कार्यकर्ताओं के वैचारिक और राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बहुत ध्यान दिया। उनके लिए राजनीतिक रूप से जागरूक, आत्मविश्वासी और स्वतंत्र महिला कार्यकर्ताओं को तैयार करना सबसे ज़रूरी था। उन्होंने हमेशा युवा साथियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे महिलाओं की समस्याओं के पीछे की बड़ी राजनीतिक और आर्थिक ताकतों को समझें। उन्होंने समझाया कि पानी, राशन, आवास, शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और हिंसा से जुड़े संघर्षों को वर्ग-शोषण, जाति-उत्पीड़न और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ बड़े संघर्ष से जोड़ना ज़रूरी है। उन्होंने सांप्रदायिक और जातिवादी ताकतों का कड़ा विरोध किया और महिलाओं की एकता पर ज़ोर दिया।
सोन्या वैचारिक दृढ़ता और व्यक्तिगत स्नेह का एक अद्भुत मेल थीं। उनका शांत संकल्प और दूसरों का हौसला बढ़ाने का गुण अदभुत था। उन्हें सुर्खियों में रहने की चाहत नहीं थी। उन्हें इस बात से संतुष्टि मिलती थी कि दूसरी महिलाएँ आत्मविश्वास से भरी नेत्री के रूप में उभर रही हैं। उनका मानना था कि आम महिलाओं में अपनी ज़िंदगी और समाज को बदलने की क्षमता होती है।
उनकी मृत्यु से एक बहुत बड़ा शून्य पैदा हो गया है। लेकिन सोन्या को सच्ची श्रद्धांजलि सिर्फ़ दुख भरे शब्दों से नहीं दी जा सकती ; इसके लिए उस काम को आगे बढ़ाना होगा, जिसके लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी थी। इसका मतलब है महिला आंदोलन को मज़बूत करना, शोषित और दबे-कुचले लोगों के संघर्षों को आगे बढ़ाना, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा करना, और सांप्रदायिकता, जातिवाद और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लड़ना।
एक कम्युनिस्ट के रूप में कॉमरेड सोन्या ने महिलाओं की स्वतंत्रता को कभी भी क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव से अलग नहीं समझा। वह समझती थीं कि क्रांतिकारी काम के लिए धैर्य, अनुशासन और त्याग की ज़रूरत होती है। वह अपने पीछे न सिर्फ़ यादें छोड़ गई हैं, बल्कि महिला कार्यकर्ताओं का एक मज़बूत समूह भी छोड़ गई हैं।
जमस, सीपीआई(एम), परी और अनगिनत साथियों और दोस्तों को उनकी कमी हमेशा खलेगी। लेकिन उनकी विरासत वहाँ ज़िंदा रहेगी, जहाँ महिलाएँ एकजुट होती हैं, जहाँ मज़दूर और किसान अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं, और जहाँ लोग न्यायपूर्ण और समतापूर्ण समाज के लिए संघर्ष करते हैं!
कॉमरेड सोन्या गिल, लाल सलाम! कॉमरेड सोन्या गिल अमर रहें!
(मरियम ढवले माकपा पोलिट ब्यूरो की सदस्य हैं।)