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कवच के बाहर राजनीति

अजय भट्टाचार्य, मुंबई.
 
महाराष्ट्र्र की राजनीति अब धीरे-धीरे अपने कवच से बाहर आ रही है। एनसीपी ने राज्य में मध्यावधि चुनाव होने के संकेत देकर राज्य की अल्पमत सरकार को छिपा सन्देश भी दे दिया है कि पार्टी द्वारा घोषित स्वैच्छिक समर्थन को भाजपा यूँ ही न ले। अब यह भाजपा को तय करना है कि पानी पिला-पिलाकर शिवसेना की बेइज्जती कर अब उससे समर्थन लेना है या नहीं। लेकिन भाजपा से ज्यादा अब शिवसेना को यह तय करना है कि सौ सौ जूते खाय तमाशा घुस-घुस देखेंगे अथवा स्वर्ग की दासता से नरक का शासन बेहतर है पर कायम रहना है। 


कवच के बाहर राजनीति
सही भी यही है की 31 अक्टूबर को हुए शपथ ग्रहण समारोह में भले उद्धव ठाकरे को भाजपा नेतृत्व ने आमंत्रित किया हो लेकिन जो सम्मान उनको मिलना चाहिए वह नहीं मिला। उद्धव की देहभाषा उस समारोह में उनकी असहजता की चुगली कर रही थी। एनसीपी अपनी राजनीति में पूरी तरह सफल रही है। चुनाव परिणाम आते ही भाजपा को बिना शर्त समर्थन की घोषणा का सीधा मकसद था कि पुराने मित्र फिर एक न होने पाएं। एनसीपी को अपनी खाल बचाने के लिए सशक्त सरकार की बजाय कमजोर और मजबूर सरकार चाहिए थी और ऐसी सरकार की प्राणप्रतिष्ठा करवाने में उसने अपनी उल्लेखनीय भूमिका भी निभा दी। सदन में कैसे बहुमत हासिल किया गया इसकी चर्चा करना यहां बेमानी है। अब स्थिति यह है कि दोनों ही पार्टियां (भाजपा-शिवसेना) अपना थूका चाटें तो कैसे? यह सही है कि राजनीति में शत्रु और मित्र स्थाई नहीं होते, स्थाई होते हैं स्वार्थ। लेकिन स्वार्थ की वेदी पर स्वाभिमान की बलि देना क्या शिवसेना को स्वीकार होगा, जिसकी दुहाई देकर शिवसेना विपक्ष के सिंहासन पर आरूढ़ हुयी है? और साथ ही साथ भाजपा वह सब देने की तयारी में होगी, जिसे ठुकराकर उसने शिवसेना को चिढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वैसे राजनीति में इस तरह के बेमेल गठबंधन अपरिहार्य नहीं हैं। 
1977 में कांग्रेस के खिलाफ सारे दल एक हो गए थे। सत्ता की लिप्सा ने चौधरी चरण सिंह को मोरारजी देसाई की सरकार के खिलाफ कांग्रेस का हथियार बना दिया। बाद में कांग्रेस की बैसाखियों के बूते चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बन तो गए लेकिन इंदिराजी ने जैसे ही समर्थन की बैसाखियाँ हटाईं चौधरीजी की सरकार चारो खाने चित्त थी और देश मध्यावधि के मुहाने पर था। ठीक यही रणनीति इन दिनों महाराष्ट्र में शरद पवार ने अंगीकार की है। परन्तु जिस मध्यावधि की आहट शरद पवार सुन और सुना रहे हैं, दरअसल वह एक सधा हुआ दांव है। दांव यह है कि यदि वास्तव में अल्पमत सरकार गिरती है तो किसी अन्य गठबंधन या दल की सरकार न बन सके जो सही भी है, नतीजतन राज्य में मध्यावधि और फिर पवार स्थिरता के नाम पर भाजपा-शिवसेना को नाकारा साबित कर सत्ता के करीब पहुंच सकें। 1989 में भी इसी तरह के प्रयोग हुए और तमाम धुर विरोधी जनता दल के बैनर तले एक हुए पर भाजपा इस कुनबे से अलग रही और 86 सांसद लेकर जनता दल की बैसाखी बन गयी। यह बेमेल गठबंधन बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ ही समाप्त हुआ और 1991 के मध्यावधि चुनाव आते-आते जनता दल के टुकड़े हजार हुए एक यहां गिरा एक वहां गिरा की तर्ज पर काल कवलित हो गया, जिसके अंशावतार देश भर में विभिन्न जनता दलों के रूप में सिमट कर रह गए हैं। इन प्रसंगों की रोशनी में यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि भाजपा और एनसीपी का रिश्ता एक अपवित्र रिश्ता है और यह कभी भी टूट सकता है। परन्तु महाराष्ट्र्र में मध्यावधि चुनाव हों यह जरुरी नहीं है। क्योंकि पता नहीं कब भाजपा और शिवसेना का डीएनए फिर मिल जाये और सरकार चल पड़े। बाकी चुनावी गाली गलौज भूल जाइये, क्योंकि नेताओं में इतनी ही शर्म होती तो देश कब का सुधर चुका होता।