नई दिल्ली। महाराष्ट्र में सत्ता गठन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया। इसके कुछ ही घंटे बाद ही 4 दिन पहले शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उप-मुख्यमंत्री अजित पवार ने पद से इस्तीफा दे दिया। फ्लोर टेस्ट को लेकर विपक्षी दल शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा सुप्रीम कोर्ट गए थे। यह पहला मामला नहीं है, जब राज्यों में सरकार गठन को लेकर राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया हो। इससे पहले 4 बार ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।
पहला मामला: कर्नाटक (1989)
एसआर बोम्मई बनाम भारत सरकार
एस.आर. बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे, लेकिन बहुमत ना होने के आधार पर राज्यपाल ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। बोम्मई ने इसे पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 11 मार्च 1994 को सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने अपने फैसले में एसआर बोम्मई को दोबारा सरकार बनाने को कहा था।
दूसरा मामला: उत्तर प्रदेश (1998)
जगदंबिका पाल बनाम भारत संघ
1998 में उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह की स्थिति बनी थी और सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत परीक्षण कराने का आदेश दिया था। उस समय राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था और कांग्रेस के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे में बहुमत परीक्षण का आदेश दिया था। इसमें कल्याण सिंह को 225 और जगदंबिका पाल को 196 वोट मिले। पाल बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए थे।
तीसरा मामला: उत्तराखंड (2016)
हरीश रावत सरकार
2016 में सियासी संकट के बाद यहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। कोर्ट ने कांग्रेस के हरीश रावत की सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका दिया था। जब फ्लोर टेस्ट हुआ तो 61 में से 33 विधायक हरीश रावत के पक्ष में आए थे और वे सीएम बने थे।
चौथा मामला: कर्नाटक (2018)
बीएस येदियुरप्पा का केस
पिछले साल ही कर्नाटक में भी इसी तरह के सियासी समीकरण बने थे। कांग्रेस ने विधायकों की खरीद-फरोख्त की शिकायत की थी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। 17 मई 2018 को भाजपा के बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 48 घंटे के अंदर विधानसभा में बहुमत साबित करने को कहा था। इसमें येदियुरप्पा कामयाब रहे और मुख्यमंत्री बने।
