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वर्मी कम्पोस्ट से किसान बढ़ा सकते हैं अपनी आय, मृदा का स्वास्थ्य भी बेहतर होगा: डॉ. मनोरंजन मोहंती

  • भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान में स्वच्छता एकशन प्लान के तहत वर्मी कम्पोस्टिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों की उत्साहपूर्ण भागीदारी

भोपाल। भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान द्वारा स्वच्छता एक्शन प्लान (एसएपी) परियोजना के अंतर्गत 23 से 25 फरवरी 2026 तक तीन दिवसीय हैंड्स-आॅन प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। प्रशिक्षण का विषय, वर्मीकम्पोस्टिंग: सतत कृषि अपशिष्ट प्रबंधन एवं आय बढ़ाने का प्रभावी उद्यम था।

यह प्रशिक्षण ग्राम रसूलिया पठार, रातीबड़, बीनापुर, कल्याणपुर, खजुरी, कलाखेड़ी, मुगलियाहाट, परवलिया सड़क एवं रतनपुर के 75 किसानों के लिए आयोजित किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को वर्मी कम्पोस्टिंग की वैज्ञानिक तकनीकों से परिचित कराना, कृषि अपशिष्ट का प्रभावी प्रबंधन सिखाना तथा इसे एक लाभकारी उद्यम के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करना था।



मृदा स्वास्थ्य एवं फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए जरुरी

प्रशिक्षण के समापन अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. मनोरंजन मोहंती ने मृदा स्वास्थ्य एवं फसल उत्पादन को बनाए रखने में वर्मी कम्पोस्ट के महत्व पर विशेष जोर दिया। साथ ही, उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर बताया कि वर्मी कम्पोस्ट केवल एक जैविक खाद नहीं, बल्कि एक प्रभावी मृदा सुधारक है।

डॉ. मोहंती ने बताया की वर्मी कम्पोस्ट, मृदा की संरचना में सुधार, जल धारण क्षमता में बढोतरी व मृदा के पीएच को संतुलित रखने में सहायक होती है। इसके नियमित उपयोग से मृदा में कार्बनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जिससे दीर्घकालीन उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।


पराली जलाने से मुक्ति पाकर पर्यावरण सरंक्षण भी होगा

डॉ. मोहंती ने यह भी उल्लेख किया कि वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जा सकता है। इससे पराली जलाने जैसी समस्याओं से भी निजात पाया जा सकता हैं। यह कार्बन उत्सर्जन कम करने के साथ, पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करता है। यह तकनीक कचरे से कमाई की अवधारणा को साकार करती है, जिससे किसान कम लागत में उच्च गुणवत्ता की खाद तैयार कर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।



फसल अवशेषों से बेहतर बना सकते हैं मिट्टी की सेहत

डॉ. संजीव कुमार बेहरा (प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख, मृदा रसायन एवं उर्वरता विभाग) ने बताया कि वर्मीकम्पोस्टिंग द्वारा फसल अवशेषों का सही उपयोग कर मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाया जा सकता है। तीन दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान संस्थान के वैज्ञानिकों डॉ. भारत प्रकाश मीणा, डॉ. आरएस चौधरी, डॉ. जेके ठाकुर, डॉ. असित मंडल, डॉ. आशा साहू, डॉ. अभिजीत सरकार एवं डॉ. दिनेश कुमार यादव ने प्रतिभागियों को वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन की वैज्ञानिक विधि, केंचुओं का प्रबंधन, कम्पोस्ट बेड की तैयारी एवं रख-रखाव, गुणवत्ता मूल्यांकन, सूक्ष्मजीव आधारित अपशिष्ट प्रबंधन तथा वर्मी कम्पोस्ट उद्यम के अर्थशास्त्र एवं विपणन प्रबंधन की विस्तृत जानकारी प्रदान की। प्रशिक्षण में प्रायोगिक अभ्यास पर विशेष जोर दिया गया, जिससे किसान स्वयं वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की प्रक्रिया को समझ सकें।


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     
         प्रशिक्षण के बाद किसानों को दिए गए प्रमाण पत्र                                                                                                                                                               
इस तीन दिवसीय प्रशिक्षण का समन्वय वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. भारत प्रकाश मीणा द्वारा किया गया। समापन अवसर पर डॉ. मनोरंजन मोहंती ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए तथा उन्हें वर्मी कम्पोस्टिंग तकनीक अपनाकर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम के अंत में प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. भारत प्रकाश मीणा ने सभी प्रतिभागियों, पाठ्यक्रम समन्वयकों एवं परियोजना स्टाफ का आभार व्यक्त किया। किसान भाइयों ने भी प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी बताते हुए इसे अपने खेतों में अपनाने का संकल्प लिया।